***** Shree Nakoda Bheruji *****
*** श्री नाकोडा भेरुदेवजी मूल मंत्र ***
प्रतिदिन सुबह पार्श्वनाथ भगवान की एवं उसके पश्चात् ही श्री नाकोड़ा भैरवदेव की एक माला गिनें एवं रविवार के दिन विशेष अपनी मनोकामना के लिए अधीक से अधीक माला का संकल्प करे |
*** श्री पारस इकतिसा ***
प.पू. तपागच्छ राष्ट्रसंत आचार्य चन्द्राननसागरसुरिश्वर्जी म.सा.
द्वारा रचित
*** श्री नाकोड़ा भैरूदेवजी चालीसा ***
(Shree Nakoda Bhairav Chalisa by Aacharya Shree ChandranandSurishwarji Marasaheb)
[wds id=”2″]
प.पू. खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभसागरसुरिश्वर्जी म.सा.
द्वारा रचित
*** श्री नाकोडा भेरूदेवजी चालीसा ***
(Shree Nakoda Bhairav Chalisa by Khartar Gachadhipathi Aacharya Shree ManiPrabhaSagarsurishwarji Marasaheb)
पार्श्वनाथ भगवान की मूरत चित बसाय
भैरव चालीसा पढ़ूँ गाता मन हर्षाय।।
नाकोडा भैरव सुखकारी,
गुण गाये ये दुनिया सारी ॥१॥
भैरव की महिमा अति भारी,
भैरव नाम जपे नर – नारी ॥२॥
जिनवर के हैं आज्ञाकारी,
श्रद्धा रखते समकित धारी ॥३॥
प्रातः उठ जो भैरव ध्याता,
ऋद्धि सिद्धि सब संपत्ति पाता ॥४॥
भैरव नाम जपे जो कोई,
उस घर में निज मंगल होई ॥५॥
नाकोडा लाखों नर आवे,
श्रद्धा से परसाद चढावे ॥६॥
भैरव – भैरव आन पुकारे,
भक्तों के सब कष्ट निवारे ॥७॥
भैरव दर्शन शक्ति – शाली,
दर से कोई न जावे खाली ॥८॥
जो नर नित उठ तुमको ध्यावे,
भूत पास आने नहीं पावे ॥९॥
डाकण छूमंतर हो जावे,
दुष्ट देव आडे नहीं आवे ॥१०॥
मारवाड की दिव्य मणि हैं,
हम सब के तो आप धणी हैं ॥११॥
कल्पतरु है परतिख भैरव,
इच्छित देता सबको भैरव ॥१२॥
आधि व्याधि सब दोष मिटावे,
सुमिरत भैरव शान्ति पावे ॥१३॥
बाहर परदेशे जावे नर,
नाम मंत्र भैरव का लेकर ॥१४॥
चोघडिया दूषण मिट जावे,
काल राहु सब नाठा जावे ॥१५॥
परदेशा में नाम कमावे,
धन बोरा में भरकर लावे ॥१६॥
तन में साता मन में साता,
जो भैरव को नित्य मनाता ॥१७॥
मोटा डूंगर रा रहवासी,
अर्ज सुणन्ता दौड्या आसी ॥१८॥
जो नर भक्ति से गुण गासी,
पावें नव रत्नों की राशि ॥१९॥
श्रद्धा से जो शीष झुकावे,
भैरव अमृत रस बरसावे॥२०॥
मिल जुल सब नर फेरे माला,
दौड्या आवे बादल – काला ॥२१॥
वर्षा री झडिया बरसावे,
धरती माँ री प्यास बुझावे ॥२२॥
अन्न – संपदा भर भर पावे,
चारों ओर सुकाल बनावे ॥२३॥
भैरव है सच्चा रखवाला,
दुश्मन मित्र बनाने वाला ॥२४॥
देश – देश में भैरव गाजे,
खूटँ – खूटँ में डंका बाजे ॥२५॥
हो नहीं अपना जिनके कोई,
भैरव सहायक उनके होई ॥२६॥
नाभि केन्द्र से तुम्हें बुलावे,
भैरव झट – पट दौडे आवे ॥२७॥
भूख्या नर की भूख मिटावे,
प्यासे नर को नीर पिलावे ॥२८॥
इधर – उधर अब नहीं भटकना,
भैरव के नित पाँव पकडना ॥२९॥
इच्छित संपदा आप मिलेगी,
सुख की कलियाँ नित्य खिलेंगी ॥३०॥
भैरव गण खरतर के देवा,
सेवा से पाते नर मेवा ॥३१॥
कीर्तिरत्न की आज्ञा पाते,
हुक्म – हाजिरी सदा बजाते ॥३२॥
ऊँ ह्रीं भैरव बं बं भैरव,
कष्ट निवारक भोला भैरव ॥३३॥
नैन मूँद धुन रात लगावे,
सपने में वो दर्शन पावे ॥३४॥
प्रश्नों के उत्तर झट मिलते,
रस्ते के संकट सब मिटते ॥३५॥
नाकोडा भैरव नित ध्यावो,
संकट मेटो मंगल पावो ॥३६॥
भैरव जपन्ता मालम – माला,
बुझ जाती दुःखों की ज्वाला ॥३७॥
नित उठे जो चालीसा गावे,
धन सुत से घर स्वर्ग बनावे ॥३८॥
॥ दोहा ॥
भैरु चालीसा पढे, मन में श्रद्धा धार ।
कष्ट कटे महिमा बढे, संपदा होत अपार ॥३९॥
जिन कान्ति गुरुराज के,शिष्य मणिप्रभ राय ।
भैरव के सानिध्य में,ये चालीसा गाय ॥ ४०॥
॥ श्री भैरवाय शरणम् ॥
[wds id=”2″]
*** श्री नाकोड़ा भेरूदेवजी की आरती ***
ॐ जय जय जयकारा, वारी जय जय झंकारा,
आरति उतारो भविजन मिलकर, भैरव रखवाला,
वारी जीवन रखवाला ॐ जय जय जयकारा ।।1।।
तुं समकित सुरनर मन मोहक, मंगल नितकारा, वारी मं.,
श्री नाकोडा भैरव सुंदर, जन मन हरनारा,
ॐ जय जय जयकारा ।।2।।
खडग त्रिशुल धर खप्पर सोहे, डमरु कर धारा, वारी ड.,
अद्भूत रुप अनोखी रचना, मुकुट कुंडल सारा,
ॐ जय जय जयकारा ।।3।।
ॐ ह्रीँ क्षाँ क्षः मंत्रबीज युत, नाम जपे ताहरा, वारी ना.,
रिद्धि सिद्धि अरु सम्पद मनोहर, जीवन सुखकारा,
ॐ जय जय जयकारा ।।4।।
कुशल कर तेरा नाम लिया नित, आनन्द करनारा, वारी आ.,
रोग शोक दुःख दारिद्र हरता, वांछित दातारा,
ॐ जय जय जयकारा ।।5।।
श्रीफल लापसी मातर सुखडी, लड्डु तेलधारा वारी ल.,
धुप दीप फूल माल आरति, नित नये रविवारा,
ॐ जय जय जयकारा ।।6।।
वैयावच्च करता संघ तेरी, ध्यान अडग धारा, वारी ध्या.,
‘हिंमत’ ‘हित’ से चित में धरता, ‘भव्यानंद’ प्यारा,
ॐ जय जय जयकारा ।।7।।
दो हजारके शुभ संवत्सर, पोष मास रसाला, वारी पो.,
श्री संघ मिलकर करे आरति, मंगल शिव माला,
ॐ जय जय जयकारा ।।8।।
श्री नाकोड़ा भेरूजी तीर्थ इतिहास
*** नाकोड़ा तीर्थ में विराजित भैरव ***

प.पू. गुरुदेव आचार्य श्री हिमाचल सुरिश्वर जी म.सा. तीर्थ का विकास एवं देखभाल की व्यवस्था में जुटे थे।एक दिन रात्रि के समय अपने उपाश्रय में पाट पर सो रहे थे। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में एक छोटा सा बालक पाट के आसपास घूमता हुआ दिखाई दिया।गुरुदेव पाट पर बैठ गए। फिर बालक को बुलाया और पूछा,” अरे बालक यहाँ क्यूँ घूमता है ? किसका है तू ?” उसी वक़्त वह बालक बोला,” मैं यहाँ का क्षेत्रवासी भैरवदेव हूँ।आप महान आचार्य श्री हैं।आप इस तीर्थ का विकास करें। मैं आपके साथ हूँ।परन्तु मुझे भगवान पार्श्वनाथ जी के मंदिर में एक आले में विराजमान करो। ऐसा बोलकर भैरव जी अदृश्य हो गए। गुरुदेव विचार में पड़ गए। परमात्मा के मंदिर में भैरव जी को कैसे बिठाया जाए ? क्यूंकि भैरवजी को सिन्दूर, बलि, मदिरा आदि सब चढ़ते हैं।जैन मंदिर में यह सारी चीजों की बिलकुल अनुमति नहीं हैं। गुरुदेव दुविधा में पड़ गए की क्या करना ?
फिर एक दिन भैरव देव को जाग्रत करने के लिए साधना में बैठ गए। साधना पूर्ण होने पर भैरव देव प्रत्यक्ष हुए और कहा,” बोलो गुरुदेव ?” गुरुदेव ने कहा,” आपको हम मंदिर में विराजमान करेंगे परन्तु हमारे जैन धर्म के नियमों में प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। तब भैरव देव बोले,” ठीक है, जो भी आप नियम बतायेंगे वो मैं स्वीकार करूँगा।” गुरुदेव बोले,” आपको जो अभी वस्तुएं भोग रूप में चढ़ती हैं, वो सब बंद होंगी।आपको हम भोग रूप में मेवा, मिठाई कलाकंद तेल आदि चढ़ाएंगे।आपको जनेउ धारण करनी पड़ेगी। विधि विधान के साथ समकित धारण करवाकर आपको ब्रहामण रूप दिया जाएगा।
भैरवदेव बोले,” मेरा रूप बनाओ।” “आपका रूप कैसे बनायें ?” तब भैरवदेव ने कहा कि जैसलमेर से पीला पत्थर मंगवाकर कमर तक धड़ बनाओ। नाकोड़ा जी जैन तीर्थ पेज की अथाह जाँचच के पश्चात यह जानकारी मिली कि, गुरुदेव ने मुनीमजी भीमजी को जैसलमेर भेजा और वहां से पीला पत्थर मँगवाया। पत्थर भी इतना अच्छा निकला।सोमपुरा मूर्तिकार को बुलाकर मूर्ति का स्वरुप बताया। पिंडाकार स्वरुप को मुंह का स्वरुप देकर मुँह और धड़ को जोड़ा और अति सुन्दर मोहनीय भैरवजी की मूर्ति बनायीं। नयनाभिरम्य मूर्ति को देखकर सब खुश हो गए। शोध कर्ता श्री नाकोड़ा जी जैन तीर्थ पेज टीम के अनुसार, वि.सं.1991 माघ शुक्ला तेरस गुरु पुष्ययोग में भैरवजी को विधि विधान के साथ नियमों से प्रतिबद्ध करके जनोउं धारण करवाकर शुभ वेला में पार्श्वनाथ प्रभु के मूल गम्भारे के बाहर गोखले में विराजमान किया गया। भैरवजी का स्थान खाली ना रहे इसलिए हनुमानजी की मूर्ति स्थापित की। इस प्रकार नाकोड़ा तीर्थ के मूल गम्भारे में बटुक भैरव ( बाल स्वरुप) विराजित हैं।
*** भैरव का मूल स्वरुप ***
भैरव एक अवतार हैं।उनका अवतरण हुआ था।वे भगवान शंकर के अवतार हैं। भैरव देव के दो रूप – 1) काला भैरव या काल भैरव (उनके रंग के कारण नाम काला भैरव पड़ा)।जिसने काल को जीत लिया वो काल भैरव हैं।आधी रात के बाद काल भैरव की पूजा-अर्चना की जाती है। श्री काल भैरव का नाम सुनते ही बहुत से लोग भयभीत हो जाते है और कहते है कि ये उग्र देवता है। लेकिन यह मात्र उनका भ्रम है। प्रत्येक देवता सात्विक, राजस और तामस स्वरूप वाले होते है, किंतु ये स्वरूप उनके द्वारा भक्त के कार्यों की सिद्धि के लिए ही धारण किये जाते है। श्री कालभैरव इतने कृपालु एवं भक्तवत्सल है कि सामान्य स्मरण एवं स्तुति से ही प्रसन्न होकर भक्त के संकटों का तत्काल निवारण कर देते है।
हिन्दू देवी देवताओं में सिर्फ ऐसे दो देव माने जाते हैं जिनकी शक्ति का सामना कोई नहीं कर सकता । एक माँ काली और दूसरा भैरव देव।इसीलिए इनकी शक्ति साधना में प्रथम स्थान है।माँ काली के क्रोध को रोकने के लिए भगवान शिव ने बालक रूप धारण कर लिया था जो बटुक भैरव कहलाया और जो काल भैरव के बचपन का रूप माना जाता है। बटुक भैरव को काली पुत्र इसलिए कहा जाता है क्यूँकी ये शिव का रूप हैं और इन्होंने काली में ममता को जगाया था। काल भैरव के मुकाबले ये छोटे बच्चे हैं।इसीलिए इनमें ममत्व है जो माफ़ कर देते हैं लेकिन उग्र रूप के कारण ये रुष्ट बहुत जल्दी होते हैं। काल भैरव अकेले शांति में रहना पसंद करते हैं, बटुक भैरव भीड़ में।दोनों की भक्ति साधना बहुत जल्द फलदायी होती है। ये अतिवेगवान देव हैं।ये भक्ति के भूखे हैं।बटुक भैरव को ही गोरा भैरव कहा जाता है।
यहा के अधिष्टायक श्री भैरव महाराज साक्षात है व उनके चमत्कार जगविख्यात है |हमेशा सैकड़ो यात्री अपनी अपनी भावना लेकर आते है |उनकी मनोकामनाए पूर्ण होती है |यहा मंदिर के अतिरिक्त कोई घर नही है |परंतु यात्रिओ का निरंतर आवागमन रहने के कारण यह स्थल नगरी सा प्रतीत होता है |प्रतिवर्ष श्री पर्श्वप्रभु के जन्म कलयानक् दिवस पौष कृष्णा दशमी को विराट मेले का तयारी होती है |
मुलनायक भगवान की प्रतिमा का तो जितना वर्णन करे कम है | एक बार आने वाले यात्रि की भावना पुन: आने की सहज ही में हो जाती है |यह स्थल जंगल में पहाडियो के बीच एकांत में रहने के कारण यहा का प्राकृतिक दृशिय देखते ही बनता है |
विश्व की सबसे विशाल नाकोड़ा भैरवजी की प्रतिमा

Shri Dakshin Nakoda Bhairav Tirth
Dodda Rangegowda Road , Tippu Nagar
Arsikere, Karnataka 573103


|| श्री संकट मोचन महाभैरव स्तोत्रं ||
|| Shree Sankat Mochan MahaBhairav Stotram ||





