नाडोल
नाडुल्य, नडुल, नर्दुलपुर, नन्दपुर,
नड्डूल, नंदुल, नंदकुलवती
राजस्थान प्रांत के पाली जिले में जोधपुर-उदपुर मेगा हाईवे पर सोमेसर रेलवे स्टेशन से २२ की.मी. दूर भारमली नदी के किनारे २५ डिग्री उत्तरी याशांश और ७३ डिग्री देशान्तर पर तथा रानी रेलवे स्टेशन से १८ की.मी. दूर पूर्वोत्तर कोठा में देसुरी से १७ की.मी. दूर, उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित ” नाडोल” प्राचीन “गोडवाड़” की राजधानी था| नाडूल्य की स्थापना ६वि शताब्दी की मानी गई है| चीनी यात्री हेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत यहां का वर्णन किया है|
११वि – १२वि शताब्दी में शाकम्भरि और नाडोल के समरविजयजी चाहमान या चौहान उत्तर भारत की प्रमुख राजनैतिक शक्ति थी| चौहान राजाओ का यह पाटनगर रहा| इन्ही के समय में नेमिनाथ, शांतिनाथ एवं पद्मप्रभु के मंदिरों का निर्माण हुआ व इन्ही के शासन में जैन धर्म की खूब प्रगति भू हुई | प्राचीन ग्रंथो एवं शिलालेखो के अनुसार इसे नडुल, नडडूल, नर्दुलपुर, नन्दपुर आदि नामो से जाना जाता था| यह भूभाग इर्सा की १०वि शताब्दी तक “सप्तशत- जनपद” कहलाता था| इसके उत्तर- पूर्व दिशा में सपादलक्ष, दक्षिण में मेदपाट और पश्चिम में गुर्जरता जनपद प्रदेश थे| यद्पी इतिहासकारों को नाडोल का इतिहास १०वि शताब्दी से अधीक पुराना प्राप्त नहीं हो रहा है, लेकिन जैन ग्रंथो ने नाडोल को २७०० वर्षो से अधीक प्राचीन माना है| वि.सं. ३०० के पहले, वनवासी गच्छ के चतुर्थ आचार्य तथा जैनाचार्य श्री देवसूरीजी के शिष्य नाडोलरत्न लघुशांति स्तवन रचइता श्री मानदेवसूरीजी ने नाडोल में चातुर्मास किया था, व यही वादीवेताल शांतिसूरीजी ने मुनिचंद्रसूरीजी को न्यायशास्त्र का अभ्यास कराया था| ११ वि शताब्दी में गुर्जर नरेश भीमदेव के समय नाडोल नगर के गुजरात के अधीन भी रहने के प्रमाण मिलते है| कहते है की नाडोल के राजाओ ने चंद्रवती के मंत्री विमलशाह को सोने का सिहासन भेट किया था| सं. ९९२ में नाडोल के राजा वाक्पतिराज रथं के तीसरे पुत्र लक्ष्मण राज के पुत्र दादाराव को श्री यशोभद्रसूरीजी ने, यही धर्म की दीक्षा दी थी| आ. श्री ने राजा लाखण को जैन धर्म का उपदेश दिया था, जिससे प्रभावित होकर राजा ने जैन मंदिरों को अपार संपति भेट की थी| नाडोल बाजार के बीच स्थित “सूरजपोल” का निर्माण भी करवाया था|
इतना ही नहीं, जैन धर्म से प्रभावित होकर राजा लाखण ने नाडोल के ही एक जैन सेठ की कनया से विवाह कर लीया| इस कन्या से उत्पन्न हुए पुत्रो को अपने राज भंडारों पर नियूक्त किया, जो आगे चलकर भंडारी कहलाए| भंडारी व कोठारी गोत्र का उत्पति स्थान नाडोल की आशापुरा देवी को अपनी कूलदेवी मानते है| सं. १२२८ में एक दानपत्र से लगता है की चौहान वंश की १२वि पीढ़ी में हुए, राजा आलणदेव ने महावीर स्वामी के नाम पर एक बावन जिनालय मंदिर का निर्माण करवाया था और उसके निर्वाह के लिए वृति निर्धारित की थी| प्रतिमाह अष्टमी एकादशी, चतुर्दशी तथा पजुषण पर्व में पशु हिंसा पर रोक लगा दी थी| इन्होने अन्य अजैन मंदिरों की व्यवस्था हेतु संपति दान स्वरुप दी |
वि.सं. १०८० में अनहीलवाड़ व सोमनाथ जाते हुए महमूद गजनवी ने, इसे लुटा व मंदिरों को तोडा| सं. ११७८८ में मोहम्मद गोरी ने तथा उसके बाद सं. ११९६ में कुतुबुधीन ऐबक ने भी नाडोल पर हमला करके, इसे लुटा और यहां की संस्कृतिक धरोहर मंदिरों को श्रति पहुचाई| वि.सं. १२०० के टीन शिलालेखों से यहां रामपाल के शासन की पुष्टि होती है| परंतु इसी समय बाली के शिलालेख बताते है की यहां तब कुमारपाल सोलंकी का राजय था| सं. १२१० के भातुन्द के शिलालेख से भी राजा कुमारपाल के शासन की पुष्टि होतो है|
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृतिक, साहित्य और शिल्पकला की कर्मभूमि रहे इस स्थल के निचे “जुनाखेड़ा” नामक स्थान दबा पड़ा है| इसकी खुदाई में नाडोल के शासक चौहान कल्हण देव द्वारा, जेठ वदी १२, सोमवार संवत् १२२३ को नारायण ब्रहमान को दान तथा केलहणदेव के पुत्र जेटसिंह द्वारा पार्श्वनाथ मंदिर में कलयाणक मोहत्सव में प्रति वर्ष दान देने के शिलालेख प्राप्त हुए है तथा मोहत्सव की याद में सिक्के प्रसारित किए थे| पूरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में मध्यकालीन सिक्के, ९ वि शताब्दी की नारी नृत्य मुद्रा, पाषण की लघु प्रतिमाए, जैन यक्ष सं. ११६०, जैन तीर्थंकर ११-१२वि सदी, कला सरस्वती १३-१४ सदी, प्राचीन किले, “ला” से संबोधन वाले रजा लाखण के सिक्के, ताम्रपत्र, बावड़ी, यक्ष-यक्षणी और परियो की पत्थर पर उकेरी गई मुर्तिया आदि प्राप्त हुए थे| यह सभी वस्तुए पाली के, बांगड़ मुईजीयम की शोभा बढ़ा रही है एवं इस बात की पुष्टि करती है की उस जमाने में यह एक सुव्यवस्थित नगर था| सं. १०२४ व सं. १०३९ के दो लेख कर्नल टॉड को मिले थे, जो उन्होंने लंदन की रायल एशियाटिक सोसायटी को सौप दिए थे| वि.सं. १२२८ के लेख के अनुसार, चौहान शासक आलाहनदेव ने १३वि सदी में भव्य, उत्कुष्ट शैली का महावीर स्वामी का बावन जिनालय बनवाया, जिसके अवशेष रूप में उस मंदिर के इष्ठयक्जिआज खेतमलजी के रूप में पूजे जाते है|
कभी यह विशाल नगरी थी, जिसमे ९९९ मंदिर व २५ बावडिया थी और यह नगरी लगभग १२ कोस के शेत्र में बसी हुई थी| इसकी हद के परकोटे में ३२ दरवाजे और ९२ बारिया थी| उस समय पाली बाली, सेवाडी, नारलाई के प्रवेशद्वार अभेध माने जाते थे| कहते है उत्तर में जोधपुर मंडोवर, पश्चिम में सांडेराव और पूर्व में गोडवाड़ की अरावली पर्वतमाला तक विस्तार लिए हुए थी| बुसी का हनुमान मंदिर व जोजावर तक सरहद फैली हुई थी| वीर काल में श्री नंदीवर्धन राजा का राजय इस प्रदेश पर था| भ. महावीर का विचरण इस भूभाग में हुआ था|
वि.सं. १७५५ में श्री गिआनविमलसूरीजी रचित “तीर्थमाला” में “नाडोल त्रिणय प्रसाद” से पता होता है की नाडोल में तीन मंदिर थे| वर्तमान में यहां चार मंदिर है| ग़ाव से 1 की.मी. पूर्व में छोटी पहाड़ी के पास जुनाखेड़ा नामक स्थान है| पहले नाडोल ग़ाव इसी स्थान पर था| यहां प्राचीन मंदिरों के भग्नावेष पड़े हुए है|
प्राचीन काल से यहां कई आचार्य ने प्रतिष्ठाए कराई| सं. ११८१ आषाढ़ सुदी १०, शुक्रवार को संडेरगगच्छीय श्री शालीभद्रसूरीजी, सं. १२१५ के वैशाख सुदी १०, मंगलवार को बृहदगच्छीय देवसूरी शिष्य श्री पद्मचंद्रगणीए, सं. १२३७ फाल्गुन सुदी २ मंगलवार को संडेगच्छीय श्री सुमतिसूरीजी, सं. १६८६ के प्रथम आषाढ़ व ५ शुक्रवार को तपागच्छीय श्री विजयदेवसूरीजी, ई. सन १६२९ में जयमल ने, ई. सन १९३२ में आ. श्री वल्लभसूरीजी ने प्रतिष्ठा करवाई| आचार्य द्रोणाचार्य तथा आ. सुरयाचार्य चौहान थे, यह उस समय के जैन धर्म के प्रभाव की व्यापकता को दर्शाता है| शायद इसलिए कहा गया है –
” सिसोदिया, सांडेसरा, चौद शिया चौहान,
चैत्यवासियो चावड़ा, गुलगुरु एह प्रणाम “
अचलगच्छ में चौथे पट्टधर पू. आ. श्री महेंद्रसिंहजी की आचार्य पदवी, वि.सं. १२६३ में यही पर हुई एवं वे धर्मघोषीसूरी के पट्टधर बने| राणकपुर तीर्थ के प्रतिष्ठाचार्य श्री सोमसुंदरसूरीजी ने सं. १४९५ के आसपास आ. श्री मुनिसुंदरसूरीजी के साथ चातुर्मास किया था|
प्रथम श्री पद्मप्रभुजी मंदिर :
छठे तीर्थंकर श्री पद्मप्रभु भगवान के इस विशाल गगनचुंबी शिखरबंध मंदिर का निर्माण, राजा कुमारपाल या रजा संप्रतिसेन मौर्य ने लगभग २४०० वर्ष पहले करवाया, जो अपनी उंचाई और कोरणी-धोरनी में अधितीय है| इस मंदिर का नाम यहां के लेखो में “रायविहार” लिखा है| इसमें मुलानायक रवि प्रतिक श्री पद्मप्रभस्वामी की १३५ सें.मी. ऊँची, बदामी वर्ण, पद्मासनस्थ प्रतिमा विराजमान है|
यह प्रतिमा जालोर के किले से, ५०० वर्ष पहले लाकर बिठाई गई, इसके पहले मुलनायक शांतिनाथ थे| कालांतर में वि.सं. १२२८ में महावीरस्वामी की प्रतिमा स्थापित की गई थी| इसकी प्रतिष्ठा लेख अनुसार, सं. १६८६ प्रथम आषाढ़ वदी ५, शुक्रवार के दिन, राजा गजसिंह के मंत्री जेसा के पुत्र जयमल ने, पद्मप्रभु बिंब कराया एवं तपागच्छीय विजयदेवसूरीजी ने जालोर में अपने पट्टधर आ. श्री विजयसिंह सूरीजी आदि परिवार की निश्रामे प्रतिष्ठा हुई व नाडोल नगर के रायविहार नाम मंदिर में, राणा जगतसिंहजी के शासन में यह बिंबस्थापन हुआ अंतिम प्रतिष्ठा मगसर सुदी ६ को आ. श्री समुद्रसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई| मुलनायक के आसपास में आदिनाथ प्रभु के दोनों बिंब भी इसी संवत् के प्रतिष्ठित है| गूढ़ मंडप में दोनों तरफ, श्री शांतिनाथजी व नेमीनाथजी के खड़े काऊसाग्गीय स्थापित है, जिनके लेख अबुसार, सं. १२१५ वैशाख सुदी १०, सोमवार के दिन, विशाड़ा ग्राम के महावीरजी मंदिर से लेकर स्थापित की गई| इनकी प्रतिष्ठा बृहदगच्छीय पं. पद्मचंद्रगनी की थी| इसी मंदिर के भाग में छोटे से शिखरवाले ,मंदिर में, मू. श्री अनंतनाथजी की प्रतिमा लेख अनुसार, सं. १८९३ माघ सुदी १० बुध को प्रतिष्ठा भ. शांतिसागरजी ने की थी|एक मंदिर में श्रीगोड़ी पार्श्वनाथजी की प्रतिमा स्थापित है| मंदिर के पीछे भाग के बगीची में आदेश्वर भगवान की चरणपादुका सं. १९५१ की प्रतिष्ठित की हुई है| इस स्थान का जलमंदिर भी कहते है| मंदिर के मुखय द्वार के ऊपर कसौटी पत्थर से बने अदभूत, अखंड चौमुखा मंदी शिल्पकला का उत्कुष्ट चमत्कार| कसौटी जैसे ठोस एवं मजबूत पत्थर में की गई बारीक नक्काशी आश्चर्यचकित करती है| प्राचीन चौमुखी चार प्रतिमाए स्थापित की गई| मंदिर के ध्वज की जमीन से उंचाई १६५ फीट है| मंदिर के प्रथम प्रवेश द्वार के बाहर श्री कानजी महाराज की मूर्ति स्थापित है| यहां मंदिर के प्रवेशद्वार पर भारी पत्थर की शिला राखी हुई है, जिसे लांघकर मंदिर में प्रविष्ट होना पड़ता है| वि.सं. १९८९, जेठ सु. ६ को समारोहपूर्वक आ. श्री वल्लभसूरीजी के हस्ते इस मंदिर की प्रतिष्ठा हुई| आग्लोड़ वाले पू. आ. श्री आनंदघनसूरीजी के हस्ते इस मंदिर में श्री पार्श्वपद्मावती की प्रतिष्ठा संपन्न हुई|
द्वितीय श्री नेमिनाथ प्रभु मंदिर : दुसरे नेमिनाथ प्रभु के विशाल शिखरयूक्त जिनमंदिर में मुलनायक की शयामवर्णी एक हाथ बड़ी प्रतिमा आकर्षक एवं चमत्कारी है| इसकी प्रतिष्ठा १८वि शताब्दी के जिणोरद्वार के समय हुई थी|
प्राचीन प्रतिमा भोयरे में है, पर किसी को मिलती नहीं| इस मंदिर का निर्माण वीर विक्रमादितय के पिता व पांडवो के वंशज महाराजा गंधर्वसेन द्वारा हुआ है| इन्होने ही इस नगर में सबसे पहले सं. ४७० में जिन चैतयालय बनवाया है| वि.सं. ७०० में आ. श्री जयानंदसूरीजी एवं उनके शिष्य श्री रविप्रभसूरीजी ने नेमिनाथ प्रभु की उत्सवपूर्वक प्रतिष्ठा कराई थी| करीब ६० वर्ष पहले भूगर्भ से प्रभु श्री आदिनाथ, पद्मप्रभु, शीतलनाथ, शांतिनाथ आदि सभी संप्रतिकालीन प्रतिमाए प्राप्त हुई, जो रंगमंडप में प्रतिष्ठित की गई है| यह मंदिर पश्चिममुखी है, जो कालांतर में परिवर्तित होकर उत्तरमुखी हो गया| इसी मंदिर में यही पर नाडोलरत्न आ. श्री मानदेवसूरीजी की योगसाधना का स्थल है, जहां बैठकर उन्होंने सदियो पूर्व “लघुशांति स्तवन ” (सोत्र) की रचना की थी| वह स्थान भूमिगत सप्तखंडा एक प्रकोष्ठ (भोयरा) है| ऐसा कहते है की यह उस भूमिगत सुरंग का द्वार है, जो नारलाई के श्री सुपार्श्वनाथ मंदिर तक बनी हुई है| इसी प्राचीन भोयरे के द्वार पर आ. श्री मानदेवसूरीजी की प्रातिमा प्रतिष्ठित है| गुरु मंदिर की प्रथम प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २४८४, वि.सं. २०१४, मार्गशीर्ष शु. ६, बुधवार को आ. श्री समुद्रसूरीजी के वरद हस्ते संपन्न हुई, दूसरी बार वीर नि.सं. २५१७ वि.सं. २०४७ द्वि. वै. सु. १३, रविवार, दी. २६ मई १९९१ को, आ. श्री पद्मसूरीजी के हस्ते आ. श्री मानदेवसूरीजी के पास आ. श्री शांतिसूरीजी की गुरु प्रतिमा की प्रतिष्ठा संपन्न हुई| यही पर करीब १८०० वर्षो से अखंड दीप प्रज्ज्वलित है| पू. आ. श्री का साक्षात दर्शन, छ: दशक पूर्व तक अनुभव होता रहा है| बाहर बरामदे में आ. श्री के जन्म से समाधी तक के वृतचित्र बने है|
कभी यह मंदिर बावन जिनालय रहा होगा | हाल में जगह खाली पड़ी है |जिणोरद्वार के समय जून अवशेष दूर कर दिए गए है| भगवान् महावीर के प्राचीन मंदिर के खंडहरो से प्राप्त तीन विशाल प्रतिमाओं को सं. २०१४ में इसी मंदिर में प्रतिष्टित की गई|
अनेक मंत्रो के जानकार महान आ. श्री महेंद्रप्रतापसूरीजी ने, संवत् १२०९ में देवी वाले लक्ष्मीप्राप्ति मंत्र की रचना इसी नगर में की थी|
तृतीय श्री शांतिनाथ प्रभु मंदिर : सुंदर पश्चिम द्वार के शिखरबंध जिनालय में मू. श्री शांतिनाथ प्रभु की सपरिकर प्रतिमा प्रतिष्ठित है, जिसके परिकर पर सं. ११८१ का लेख है|मू. शांतिनाथ प्रभु की प्रतिष्ठा सं. १६८६, आषाढ़ सु. ५ को, आ. श्री विजयदेवसूरीजी एवं आ. श्री विजयसिंहजी के हस्ते संपन्न हुई थी | मूलनयक के आसपास सुपार्श्वनाथ व पार्श्वनाथ प्रतिमाए सं. १९९८, मार्ग सु. ६, सोमवार को पं. कलयाणविजयजी के हस्ते संपन्न हुई थी|
रंग्मंड़प की प्रतिमाए संप्रतिकालीन है| मंदिर के बाहर दो प्राचीन शिलालेख दीवार में गड़े है| दरबारगढ़ की दूसरी बाजू में आया है| इसका द्वार वर्तमान में मुखय बाजार में स्थित है| यह मंदिर १२वि-१३वि शताब्दी में राव आल्हणदेव के समय का है| अलग-अलग ग्रंथो में यहां ऋषभदेव तथा गुंबजवाला उत्तर द्वार का जीरावाला पार्श्वनाथ मंदिरों का उल्लेख मिलता है| जिसमे पाषण की तीन प्रतिमाए विराजमान थी|
चौथा श्री कुंथुनाथ प्रभु का मंदिर :
मौजूदा उपाश्रय से लगकर करीब २५० वर्ष प्राचीन श्री कुंथुनाथ प्रभु का जिनमंदिर है |जिसका जिणोरद्वार होकर नवनिर्मित जिनालय में प्राचीन कुंथुनाथ आदि जिनबिंबो की प्रतिष्ठा सह नूतन मुनिसुव्रत स्वामी व शंकेश्वर पार्श्वनाथ जिनबिंबो की अंजनशलाका व प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५३५, वि.सं. २०६५, जेठ सुदी ५, गुरूवार दी. २८ मई २००९ को, पू. आ. श्री पद्मसूरीजी एवं पू. पं. श्री चिदानंद विजयजी के हस्ते संपन्न हुई | इसके पूर्व ३१.५.२००६ को खनन व 1.६.२००६ को शिलान्यास आ.श्री हिरणयाप्रभसूरीजी के हस्ते संपन्न हुआ था|
मेह्तावास स्थित अंबामाता जैन मंदिर का निर्माण वि.सं. २००३ वैशाख सुदी ६ को हुआ, जिसमे मा आंबे की २७ इंच ऊँची, आठ भुजाओं वाली चमत्कारी प्रतिमा विराजमान है| यहां अखंड दीप प्रज्ज्वलित है| गाव में करीब ५५० जैनों के घर है|
पांचवा श्री मुनिसुव्रतस्वामी मंदिर : रानी स्टेशन से आते समय ग़ाव से ३ की.मी. पहले बाई तरफ श्री मानदेववल्लभ विहार परिसर में श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी का शिखरबंध शानदार जिनालय, सौ. कोकिलाबेन मांगीलालजी पुनमिया परिवार ने चार वर्ष पहले निर्माण करवाया |इसकी खनन विधि सं. २०६३ द्वि. जेठ सुदी १०, सोमवार दी. २५.६.२००७ तथा शिलान्यास जेठ सु. १३, गुरूवार दी. २८.६.२००७ को आ. श्री नित्यानंदसूरीजी के हस्ते संपन्न हुआ तथा वि.सं. २०६५ मगसर सुदी ३, रविवार दी. 30.११.२००८ को, पू. पं. प्रवर श्री चिदानंद विजयजी आ. ठा. की निश्रा में, मू. श्री मुनिसुव्रतस्वामी आदि जिनबिंब एवं नाडोलरत्न श्री मानदेवसूरीजी, आ. श्री वल्लभ सूरीजी आदि गुरुबिंबो की प्रतिष्ठा संपन्न हुई थी| इसके सामने श्रीमानदेवसूरी गौशाला है | श्री जैन सोशल ग्रुप, नाडोल /मुंबई यहां की प्रमुख सहयोगी संस्था है| जूनाखेड़ा के पास गोशाला में “हेलिपैड“बना हुआ है| दस की.मी. दूर “जीवनकाला” ग़ाव मंदिर की व्यवस्था नाडोल पेढि देखती है |
नाडोल की एतिहासिक एवं सांस्कृतिक वैभव की धरोहर : नाडोल के मुखय मंदिर, बावडिया, तालाब, प्राचीनतम, अवशेष, गढ़, एतिहासिक तथय, पूरातत्व एवं सांस्कृतिक वैभव की धरोहर है| प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टॉड ने यहां की बावडियो की प्रशंसा में खूब लिखा है|
राणीबाव : राव लाखण की पटरानी, जो गढ़पाटन की राजकुमारी थी, उसने अपनी स्मृति में इस बाव का निर्माण करवाया था| यह अष्टकार वास्तुकला के आधार पर निर्मित है | १०७ x ४३ फीट लम्बी-चौड़ी व ७० फीट गहरी यह बाव तीन खंडो, गोखारो, बुर्ज, सीढियो, पगोतियो, बैठक थम्बो पर सुन्दर कारीगरी का अदभूत नमूना है| नारलाई सड़क पर यह सुन्दर बाव सहस्त्र वर्षो से अपनी पहचान रखती है| बस स्टैंड के उत्तर में कथवारी बाव, पूर्व दिशा में महादेव मंदिर के पास धुआंबाव, जुनाखेड़ा के उत्तर दिशा की ओर, चौकोर पत्थरो के अतुलनीय शिलाखंड से निर्मित मूंग्बाव, जुनाखेड़ा से दक्षिण की ओर चारकोनो यूक्त लम्बे खड़े प्रस्तर से निर्मित देवकीबाव , रखेश्वर तालाब के पास कमोदनीबाव, तीन मंजिला अनगढ़ पत्थरो का नमूना कारीगरी शोभाबाव, प्राचीन जर्जर शिवमंदिर के पास खोखरीबाव, परमारवंशीय कुंद पत्थरो से निर्मित रखेश्वरकुंड, खारडा रोड पर स्थित शुखबाईबाव, जैन मंदिर के पास सुन्दर बनावट की जैन अम्बाबाव, बगीचे के पास स्थित वारिबाव, वि.सं. १०३९ में निर्मित, ६० गहरी सीढ़िया, सोनाणा पत्थर की निर्मित आशापुरा लाखणबाव यहां की एतिहासिक धरोहर है|
गोलेराव तालाब : २०० बिघा जमीन में फैला हुआ, नाडोल का प्राचीन तालाब, पालपर अनेक चबूतरे, छत्रीया, १७वि शताब्दी के स्मारक, सती के धड़े आदि स्वच्छ पानी का तालाब ८०० वर्ष प्राचीन है|
मंदिर : रिखेश्वर महादेव मंदिर अति प्राचीन है| यही पर सम्राट पृथ्वीराज के पिता की मृत्यु हुई थी| सोमनाथ मंदिर १०८ फीट ऊँचा है| पातालेश्वर महादेव भारमली नदी के तट पर है, भगवान विष्णु का स्थल मंदिर, गंगालहर मंदिर, सुरय मंदिर, अंसीबाई की समाधी, गोगामढ़ी, नागो का मंदिर आदि इन्द्रमाल व काग्लाव टेकरी ८वि से १०वि शताब्दी की है|
यहां एक कहावत प्रसिद्ध है की
” सुंगो मिले तो साणडेरा-नि मिले तो नाडोल ” |
अलग-अलग नामो से प्रसिद्ध, दरवाजे व पोल, रावला-नाडोल का पुराना रावला भारमल नदी के उत्तरी भाग में विधमन है| यहां के गेर, गैवरी, घुमर, तुर,वारणा तओहारप्रसिद्ध है| वर्ष में अनेक मेले भरते है | यहां पर रिखी-भाखरी (ऋषि पर्वत) है, जहा सैकड़ो मुनियो ने तपसयाए की है| पहाडो से घिरा एक ऋषि तालाब भी है| यह शिव और शक्तिपीठ का संगम स्थल है|
श्री आशा माताजी : नाडोल ग़ाव से करीब डेढ़ की.मी. दूर, श्री आशापुरा माताजी के मंदिर का निर्माण, राजेश्वर महाराज श्री लाखणसी चौहान द्वारा करवाकर, संवत् १००९ के माह सुदी २ को प्रतिष्ठा करवाई गई| अनेक गोत्र परिवारों की कुलदेवी होने से यहां दर्शनार्थ हमेशा भीड़ रहती है|
नाडोल रत्न
भगवान महावीर के पाटपटावली के १७वे पट्टधर बाल ब्रह्मचारी
प. पू. आ. श्री मानदेवसूरीजी (प्रथम) – नाडोल
जन्म : नाडोल में विक्रम की ३रि शताब्दी में नाडोल के सेठ धनेश्वर की धर्मपत्नी धारणी की रत्न कुक्षी से इनका जन्म हुआ | अपना एकमात्र पुत्र होने के कारण माता-पिता ने नाम रखा मानदेव| एक बार आचार्य श्री प्रधोतनसूरीजी ग्रामनुगाम विचरण करते नाडोल पधारे| उस दौरान आ. श्री की वैरागयभित वाणी सुनकर, मानदेव के हृदय में वैराग्य तरंगित हो गया| माता-पिता से आगिया प्राप्तकर शुभ समय में दीक्षा अंगीकार कर वे विनयपूर्वक व कठोर तप की साधना करने लगे| आपके तप, गिआन व ब्रह्मचार्य के बल से जया-विजया नामक देव़िया दर्शन व वंदन के लिए आती थी |लक्ष्मी व सरस्वती आपके कंधे पर अदृश्य विराजमान थी और सिद्धहस्त थी|
सभी तरह से योगय जान गुरु ने इन्हें आचार्य पद पर आरूढ़ किया| आपने संपूर्ण रूप से विगई-विकृति का परित्याग कर दिया| आ. श्री ने पंजाब, सिंध, तक्षशिला, देराऊल आदि स्थानों में विचरण कर सोढा राजपूतों को प्रतिबोधित कर जैन धर्मावलम्बी बनाया था| तक्षशिला में उन दिनों ५०० जैन मंदिर थे, एक बार भयानक महामारी मरकी बिमारी का प्रकोप हुआ| शासनदेवी की आराधना से देवी द्वारा ग़ाववालो को मार्गदर्शन प्राप्त हुआ की नाडोल नगर में महाप्रभावक आचार्य श्री मानदेवसूरीजी के चरणोंदक के छिडकाव से उपद्रव शांत हो जाएगा| देवी के कथनानुसार श्री संघ ने वीरचंद नामक श्रावक को नाडोल भेजा| वीरचंद ने आ. श्री ने तक्षशिला जाने से मना कर दिया तथा सूरीजी ने यही पर “मंत्राधिराज गर्भित शांतिस्तव स्तोत्र” बनाकर दिया और कहा की इस स्तोत्र का पाठ करके, पानी का छिडकाव करने से उपद्रव शांत हो गया| इसके अलावा सूरीजी ने व्यन्तर के निर्वानार्थ “तीजयहुत्त स्तोत्र” की रचना की भी |नाडोल भूमि पर जन्मे महान प्रतिभा संपन्न आ. श्री मानदेवसूरीजी का गिरनार तीर्थ पर, वीर नि.सं. ७३१ व विक्रम संवत् ३२१ में अनशनपूर्वक स्वर्गवास हुआ| आपकी पाट पर आपके शिष्य भक्ताम्बर स्तोत्र रचीयता श्री मानतुंगसूरीजी विराजे | आ. श्री मानदेवसूरीजी ने वि.सं. ३०० के आसपास नाडोल में चातुर्मास किया| उपद्रव के बारे में, कही-कही पर शाकम्भरी एवं नाडोल का भी उल्लेख मिलता है | ऐसे महान सूरीजी के चरणों में कोटि-कोटि वंदना …|










