History of Bijova (Godwad – Rajasthan)
बीजोवा गाँव का परिचय
गोडवाड़ की पंचतीर्थी का प्रथम तीर्थ एवं तिमिरतरणी गुरु वल्लभ व मरुधरोदारक गुरु ललितजी की कर्मभूमि-शिक्षा केंद्र वारकाणा से करीब २ की. मी. , औधोगिक नगरी फालना से पूर्व दिशा में १५ की. मी. एवं राष्ट्रीय राजमार्ग क. १४ के केनपुरा बस स्टैंड से१५ की. मी. दूर मुखय सड़क पर स्थित है ” बिजोवा” तीर्थ , जिसका प्राचीन नाम है ” विद्धपुर” |
प्राचीन काल में यह नगर वारकाणा व दादाई ग़ाव का ही एक हिस्सा था | यह विशाल स्वरुप निरंतर होने वाले लड़ाई व उससे होनेवाली तबाही के कारण समय के साथ-साथ काल कवलित हो गया |
वर्तमान में ग़ाव जहां विद्धमान है, उसकी प्राचीनता के बारे में कोई साक्षय व जनप्रामाणिक तथय तो उपलब्ध नहीं है , फिर भी ऐसा माना जाता है की आज जहां यह ग़ाव स्थित है, वो पूर्व समय में वर्तमान आबादी से करीबन २ की. मी. दूर पश्चिम में अवस्थित था, जहां अब भी अवशेष के तौर पर श्री महादेवजी व श्री शीतला माताजी मंदिर और एक प्राचीन बावड़ी मौजूद है |वह स्थान जुना खेड़ा महादेवजी के नाम से जाना जाता है |
ग़ाव का अतीत बहुत ही गौरवपूर्ण रहा है | भूतकाल में भी इस ग़ाव के जैन समाज ने गोडवाड़ अंचल में अपनी कुशाग्रबुद्धि, सुझबुझ एवं दानशीलता की धाक जमा राखी थी व गोडवाड़ के मानचित्र पर बीजोवा की अमिट मुहर लगी है |” सादड़ी के साठ और बिजोवा के आठ “ जैसी को चरितार्थ करने वाले अनेक गणमानय ग़ाव के गौरव रह चुके है |
प्रतिमा के लेख अनुसार , वि. सं. ११२३ में प्रतिष्ठित होने की बात स्पष्ठ होती है| वि. सं. १२०० के बाली जैन मंदिर के शीलालेख से यहां सोलंकिया के शासन की पुष्टि व भाठुन्द से वि. सं. १२१० जेष्ठ सुध . ६, गुरूवार , दी. २० मई ११५४ के लेख अनुसार , चालुक्स कुमारपाल के शासन की पुष्टि होती है | बीजोवा व दादाई की सीमाए वारकाणा से जुडी होना नगर की प्राचीनता को प्रकट करता है | साथ ही राजा कुमारपाल सोलंकी के शासन की पुष्टि, मंदिर का निर्माण जिनशासन प्रेमी राजा कुमारपाल द्वारा होने का संकेत करती है | जो भी हो मंदिर व प्रतिमा ११वी सदी के होने की बात स्पष्ट है |
वरकाणा के शिलालेख के अनुसार, अकबर प्रतिबोधक आ. श्री हीरसूरीजी के शीषय मार्लाईरत्न सुरसवाई आ. श्री विजयसेनसूरीजी व गणी श्री कमलविजयजी के वि. सं. १६४० के करीब बीजोवा में चातुर्मास का उलेख प्राप्त होता है |
श्री वरकाणा मंदिर के प्रवेश द्वार पर सं. १९५१ के शिलालेख अनुसार , वि.सं. १९५१ के माघ सुदी ५ गुरूवार को ६०० जिनबिंबो की, अंजनशलाका प्रतिष्ठा भट्टा रक् श्री राजसूरीजी के हस्ते व बीजोवा चातुर्मास विर्जीत पद्मसागरजी के उपदेश से ” बीजोवा संघ ” ने करवाई थी | इस प्रतिष्ठा के बाद बीजोवा और दादाई के जैन संघो को तीर्थरक्षा महसूस हुई | इसके पहले वि. सं. १९३२ में आ. श्री विजयानंदसूरीजी (पू. आत्मारामजी ) ने तीर्थ महत्ता को बढानें हेतु बीजोवा व दादाई संघ से वार्तालाप करके तीर्थ की देखभाल प्रारम्भ करवाई |
वरकाणा के एक और शिलालेख के अनुसार- ” संवत् १६७ वर्षे विद्धपुर विश्रमय … यात्रा की वरकाणा तपा कलयाण विजयजी श्री पार्श्वतीर्थ “ अर्थार्त संवत् १६७७ में विद्धपुर (बिजोवा) में चातुर्मास पूरा कर तपा. श्री कलयाणविजयजी ने वारकाणा तीर्थ की यात्रा की | यह कलयाण वि. आ. श्री हीरसूरीजी के शीषय थे |
वि. सं. १७४९ फा. सु. १० ,दी. ६ मार्च, १६९३, सोमवार को महाराणा जयसिंह ने घानेराव के ठाकुर गोपीनाथ को परगने गोडवाड़ में २३ गावों को और पट्टा दिया, जिसमे खीमेल, बिजोवा, वारकाणा ,लुणावा आदि मुखय थे| वि. सं. १९८४ का चातुर्मास आ. श्री वल्लभसूरीजी व मू. श्री विकास विजयजी म. सा. ने किया | इस्सी तरह सन १९५७ ई. में आ. श्री समुद्रसूरीश्वरजी म. सा. और सन १९८० ई. में आ. भगवंत विजय इन्द्र दिन्नसूरीश्वरजी ने भवय चातुर्मास किया |
वि. सं. १९९९ का चातुर्मास आ. श्री ललितसूरीजी व सं. २०५० का चातुर्मास आ. श्री सुशीलसूरीजी ने किया |सं. २००६ ,पौष सु. ८ को ” संघ और संगठन” विषय पर आ. श्री वल्लभसूरीजी के व्याखयान व प्रभाव द्वारा बिजोवा ने दोनों पक्षों में एकता का संचार किया| अनेक पुनयशाली आत्माओं ने संयम का मार्ग स्वीकार कर कुल व नगर का नाम रोशन किया |
श्री मरुधर सेवा निकेतन , श्री आदर्श जैन ग्रुप, श्री जैन यूवक संवा संघ , श्री पूना प्रवासी श्वे. जैन संघ व श्री पार्श्व महिला मंडल, श्री संघ की सहयोगी संस्थाए है| देवहित दोषी द्वारा संपादित व प्रकाशित” श्री बिजोवा दर्पण- २००४” का विमोचन तत्कालीन जिलाधीश श्री कुलदीपजी रांका के हस्ते हुआ है |
मरुधर सेवा निकेतन संस्था की स्थापना आ. श्री ललितसूरीजी से प्रेरणा पाकर , वि. सं. २०२४ के श्रावण सुदी पूर्णिमा , दी. ८ अगस्त १९६८ को राजस्थान के भूतपूर्ण मंत्री श्री फूलचंदजी बाफना के करकमलों से हुई थी| ५ जून १९९४ की ” बिजोवा निर्देशिका” का विमोचन संस्था द्वारा डॉ. पन्नालालजी दोषी के हस्ते संपन्न करवाया था |श्रीमान देवराज हीराचंदजी दोषी इस निर्देशिका संपादक और प्रकाशक थे| श्री जैन यूवक सेवा संघ की स्थापना ७ जून १९७८ को हुई थी|
तालाब के पास श्री पालेश्वर महादेव , श्री चारभुजाजी, श्री चामुंडा माताजी आदि अनेक प्रसिद्ध अजैन मंदिर है| यहां का सिद्धि विनायक गणपति मंदिर विशेष प्रसिद्द है |
यहां के जैन संघ के चुनाव की प्रक्रीया सारे गोडवाड़ में प्रसिद्ध है|
श्री चिंतामणी पार्श्वनाथ मंदिर :
नगर के हृदयस्थल में नीम व वट वृक्ष की झुरमूट में. किले जैसे परकोटे से यूक्त विशाल व कलात्मक ९ शिखरबंध प्राचीन जिनालय में, २३वे. तीर्थंकर श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ प्रभु की नीलवर्णीय, पद्मासनस्थ प्राचीन कलात्मक पीरकर से शोभित प्रतिमा प्रतिष्टित है, जो नौ नाग्फानो से यूक्त चिंताहरण करने वाली और चित को आनंददित करने वाली है| श्री १०८ पार्श्वनाथ नाम गभित प्राचीन छंदों में, श्री बिजोवा पार्श्वनाथ नाम का भी समावेश हुआ है| ग़ाव के नाम से तीर्थपति का नाम पड़ा है | १२वि सदी के प्राचीन लेख संग्रह ग्रंथ (भाग-1) के एक लेख के अनुसार –” संवत ११२३…….सुदी ८ सोमे , श्री शंडरेक संताने लधमादे जिनालय| शांतिसुरेगिरा वीर: संगोष्ठयकारी मूक्रय ||१|| “व” सं. १२५८ वर्षे महं विल्हनें जिनोद्वार(:) कृत: “
पीरकर के निचे अंकित लेख से गिआत होता है की श्री शंडरेकगच्छचिय शान्तिसूरीजी ने वि. सं. ११२३, ….. सुदी ८, सोमवार को इस जिनालय में मुलनायक के रूप में श्री शांतिनाथ भगवान को विराजमान किया गया था| इसके बाद इस्सी पीरकर में सं. १२५८ में जिनोर्द्वार के बाद भगवान महावीर स्वामी को मुलनायक के रूप में स्थापित किया |वर्तमान में मुलनायक श्री पार्श्वनाथ है, जिनकी प्रतिमा प्रतिष्ठा सं. १६४४ में हुई थी| इससे स्पष्ट होता है की यह चैतय और बिजोवा ग़ाव का बसना कितना अधिक प्राचीन है |
वर्तमान में इस जिनालय में विराजमान मुलनायक सहित सभी प्रतिमाओं एवं आ. श्री वल्लभसूरीजी की नूतन गुरु प्रतिमा की जिणोरद्वार पश्चात प्रतिष्ठा वि. सं. २०१४, पौष वादी 1 को यूगदुष्टा विजय वल्लभसूरीजी के पट्टालंकार शांत तपोमूर्ति आ. श्री समुद्रसूरीजी (पालिरत्न) के सुहस्ते संपन्न हुई थी |
भमती में श्री पार्श्वनाथजी के निचे सं. १७७२ का लेख है| एक और प्रतिमा पर सं. १९०३ का लेख है |
वि. सं. २०४६ के वैशाख सुदी ३(अक्षय तृतीया), सोमवार दी. ८ मई १९८९ के दिन , पू. आ. श्री सुशीलसूरीजी के हस्ते , नूतन गुरु मंदिर में शुभ लग्न में आ. श्री शान्तिसूरीजी , आ. श्री ललितसूरीजी व आ. श्री समुद्रसूरीजी की प्रतिष्ठा संपन्न हुई |
रंग्मंड़प में प्रतिष्टित श्री वसुपुजय स्वामी प्रतिमा की प्रतिष्ठा वि. सं. २०१३ के माघ सुदी १४, बुधवार एवं प्रभु श्री अरनाथजी व कुन्थुनाथजी प्रतिमा की प्रतिष्ठा वि. सं. २०२४ , फा .सु. ३ शुक्रवार को आ. श्री विजयकैलास सगर्सुरीजी के हस्ते संपन्न हुई है| एक और पार्श्वनाथजी प्रतिमा की अंजनशलाका बीसलपुर में, वि. सं. १९९२, वाई. सु. १० को आ. श्री ऊँकारसूरीजी के हस्ते हुई |भमती में श्री नाकोडा भैरवदेव की प्रतिमा की प्रतिष्ठा गच्छाधिपति आ. श्री विजय नित्यानंदसूरीजी म. सा. के वरदहस्ते , वि. सं. २०६२, जेष्ठ वादी ७ , दी. १९ मई २००६ को संपन्न हुई |इसका खनन दी. ९.१२.२००५ को हुआ था |
श्री संभवनाथजी मंदिर :
मुख्य सड़क पर बस स्थानक के समीप, आधुनिक शिल्पकला को अपनी गोद में समाए, इस जिनप्रसाद में, तृतीय तीर्थंकर श्री संभवनाथ प्रभु की प्रतिमा पहली मंजिल पर प्रतिष्टित है| श्री संघ की वास्तु पर श्री मुनालालजी केसरीमलजी बोराणा दोशी परिवार ने इस जिनालय का निर्माण करवाकार श्री संघ को सुपुर्द कर दिया | वहीवट श्री संघ पढ़ी, बिजोवा करती है |मंदिर के तल मंजिल पर जैन शासन रक्षक, प्रकट प्रभावक श्री घंटाकर्ण महादेव की अनूठी व मनलुभावन प्रतिमा प्रतिष्टित है|
मंदिर की प्रतिष्ठा आ. श्री सुबोध सागरसूरीजी एवं आ. श्री मनोहर कीर्तिसूरीजी के हस्ते, वि. सं. २०४६, आषाढ़ वादी २, रविवार दी. १० जून १९९० को संपन्न हुई थी |
दादावाड़ी गुरु मंदिर : इसी मंदिर के पास शेष्टिवरय श्री अगरचंदजी गुलाबचंदजी कांकऱिया परिवार द्वारा निर्मित गुरु मंदिर में योगिराज श्री शान्तिसूरीजी , आ. श्री ललितसूरीजी व आ. श्री समुद्रसूरीजी की प्रतिमाए प्रतिष्टित है| इसकी प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २५१५ , वि. सं. २०४५, वैशाख सु. ३ (अक्षय तृतीय) , सोमवार दी. ८ मई १९८९ को नितिसमुदाय के आ. श्री सुशीलसूरीजी के हाथों संपन्न हुई थी |
श्री शंखेश्वरजी पार्श्वनाथ मंदिर :
बिजोवा से आधा की.मी. दूर मुखय सड़क पर श्री बोकाड़िया परिवार द्वारा स्वद्रव्य से नवनिर्मित सौध शिखारी जिन मंदिर में मुलनायक श्री संखेश्वर पर्श्वनाथादी जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वि. सं. २०६४, माघ कृष्णा ६, सोमवार दी. २८.1.२००८ को प्रात: शुभ लग्न में श्री रामचंद्रसूरीजी के समुदायवर्ती आ. श्री मुक्तिचंद्रसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में संपन्न हुई थी | इसका खनन वि. सं. २०५४ मार्गशीर्ष कृ. ३ ई .सन १९९८, रविवार व शिलानयास वि. सं. २०५४ के मार्गशीर्ष कृ. १० रविवार, ई. सन १९९८ में संपन्न हुआ था |
श्री मणिभद्रजी मंदिर : जैन पेढ़ी के ठीक सामने उपाश्रय की एक छत्री में जागृत व चमत्कारी श्री मणिभद्र दादा का मंदिर स्थापित है |
श्री विजयवल्लभ द्वार : इसका उद्गाटन समारोह पू. आ. श्री धर्मधुरंधरसूरीजी की निश्रा में व माँ. श्री पुष्पजी जैन मुख्य अतिथि की उपस्तिथि में दी. २४ मई, २००० को शा. छोगमलजी हीराचंदजी बोराणा दोशी के करकमलो से संपन्न हुआ |





