आचार्य श्री विजय चिदानंदसुरिश्वर्जी म.सा.

एक महान व्यक्तित्व , परम तपस्वी एवं प्रभावी प्रवचनकार संत का सहज और सरल जीवन
चरम तीर्थपति, शासननायक भगवान श्री महावीर स्वामी जी ने साधू-साध्वी-श्रावक-श्राविका स्वरुप चतुर्विध संघ की स्थापना कर जिनशासन की समुचित व्यवस्था कर हम सभी के आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया| परमात्मा की अखंड श्रमण परंपरा में समय समय पर ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हुए है जिन्होंने जिनशासन के प्रकाश से स्वयं को प्रकाशित कर चारों दिशाओं में जिन्धर्म की महती प्रभावना की है|
श्री दशवैकालिक सूत्र में फरमाया गया है – जिनेश्वर भगवान की आज्ञानुसार दीक्षा लेकर जो सदा उनके वचनों में सावधान रहते है, ममत्व बुद्धि का त्याग कर छोड़े हुए विषयों का पुन: सेवन नहीं करते, वाही सच्चा साधू है|
वर्तमान शोषित वातावरण में एक ओर जहाँ विज्ञान के प्रयोग चारों दिशाओं में कोलाहल मचा रहे है, भौतिकवादी युग में पारम्पारिक संस्कारों से विमुख होकर स्वार्थ साधना में लगे है, वही अपनी संस्कृति को मूल रूप में समेटे जिनेश्वर परमात्मा के संदेशवाहक राग से विराग एवं संसार से संयम के मार्ग की ओर अग्रसर होकर सम्पूर्ण मानवता को दुर्लभ जिनवानी का पान करवाकर अपना आत्मकल्याण एवं समजोद्वर करने की उच्च कोटि की अनुमोदनीय जीवनशैली यापन कर रहे है , जिनके प्रति केवल मानव ही नहीं अपितु देवतागण भी नतमस्तक होते है वर्तमान समय के ऐसे ही शासनप्रभावक संतों की श्रेणी में ज्ञानयोगी पंन्यास प्रवर श्री चिदानंद विजयजी का भी शीर्षस्थ नाम है|
जन्म एवं दीक्षा
शिवपुरी (मध्य प्रदेश) निवासी श्री खंजाचीलालजी लिगा की धर्मपत्नी श्रीमती कश्मीरावंती जैन की रत्नकुक्षी से २२ सितंबर १९६० को एक तेजस्वी पुत्ररत्न का जन्म हुआ था| उसका नाम ” कपिल कुमार” रखा गया था| स्कूल के विद्या अध्ययन में कपिल को गणना मेधावी छात्रों में जाती थी| अपने सभी अध्यापकों के प्रति विनय भाव उनके स्वभाव का अभिन्न अंग था| बाल्यकाल से ही उनकी तर्ककुशल बुद्धि सभी को निरुतर कर देती थी| किसी भी बात को पूरा समझने की कला – कपिल कुमार का स्वाभाविक गुण बन चूका था| माता-पिता के संस्कारों से कपिल कुमार ने जैन धर्म के बारे में भी जाना , समझा| कीमती-कपिल-प्रवीण-कीर्ति, परिवार के चारों बेटे क्रमिक रूप में विकासित हो रहे थे|एक बार मुनि वल्लभदत्त विजय जी ने श्रावकरत्न श्री खांजाची लाल जी को कहा की तुम मानो या न मानो, तुम्हारा एक बीटा, एक दिन जिनशासन की ध्वजा को चारों दिशाओं को फैलाने वाला होगा| उस समय पिताश्री ने इस बात को हंसकर टाल दिया एवं समय की गति यशावत चलती रही| मुनिभूषण श्री वल्लभदत्त विजय जी (फक्कड़ बाबा) के सन १९७४ के शिवपुरी (म.प्र.) में चातुर्मास से प्रारम्भ हुई धर्मयात्रा को कपिल कुमार ने सदा प्रवाहमान रखा| परिवार का यह नियम था – की परमार क्षत्रियोद्वारक आचार्य श्रीमद् विजय इन्द्रदिनन सुरिश्वरजी म.सा. की निश्रा में जहाँ भी संक्रांति होगी, परिवार का एक व्यक्ति अवश्य ही जाएगा| कभी खांजाचिलाल जी स्वयं जाते,कभी उनके भाई जाते, कभी कीमती-प्रवीण या कीर्ति जाते, ऐसे कई वर्षों तक कपिल कुमार के जाने का संयोग नहीं बना| एक बार पिताजी ने कपिल कुमार को बुलाकर कहा की आगामी संक्रांति पर तुम्हे ही परिवार की ओर से जाना है| योगानुयाग , आचार्य विजय इन्द्रदिन्न सुरिश्वरजी के प्रेरक प्रवचन, मुनि श्री नित्यानंद विजयजी (वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य) की वैराग्यमयी वाणी एवं साध्वी सुमंगला श्रीजी के उद्बोधन से कपिल कुमार के अंतमार्नस में पहली बार ही गुरुदर्शन करते ही पिछले भवों के संस्कार प्रगाढ़ हो गए एवं उनकी भावना संयम धर्म अंगीकार करने को ही चली| शिक्षा क्षेत्र में बी. कॉम कर चुके एवं सी.ए. की तैयारी कर रहे कपिल कुमार के अचानक ऐसे निर्णय में रहकर भी साधुवत रहकर भी उन्होंने अपनी इस भावना की दृढ़ता को प्रकट कर दिया एवं अंतत: सम्पूर्ण परिवार ने हर्षोल्लास पूर्वक दीक्षा की आज्ञा प्रदान की|
संयम जीवन
२४ वर्षीय युवा मुमुक्षु कपिल कुमार के दीक्षा की मंगल वेला आई| २२ जनवरी १९८४ के शुभ दिन गुरु वल्लभ जन्मभूमि – बड़ोदा में आचार्य विजय इन्द्रदिनन सुरिश्वर म.सा. के वरद हस्ते से मुमुक्षु कपिल कुमार की दीक्षा संपन्न हुई| वे शांतिदूत मुनि श्री नित्यानंद विजयजी (वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य) के प्रथम शिष्य ” मुनि चिदानंद विजयजी” के रूप में घोषित किये गए| अपने प्रथम उद्बोधन में मुनि चिदानंद विजयजी ने यही आवाहन किया की हे माँ , मुझे आशीर्वाद दे की मई तेरे दूध की लाज रख पाऊं और परम पुण्योदय से प्राप्त यह रजोहरण अवं संयम धर्म को निष्कलंक रखकर जीवन सार्थक कर सकूँ |
दीक्षा पश्चात मुनि श्री चिदानंद विजयजी ने अपना सर्वस्व गुरु सेवा और स्वाध्याय को समर्पित किया| विधागुरु श्रुतभास्कर आचार्य विजय धर्मधूरंधर सुरिश्वर्जी की निश्रा में रहकर बुद्धि कौशल के धनि मुनिश्री ने अल्प समय में संस्कृत प्राकृत आदि, भाषाएँ, न्याय-वैशेषिक आदि षडदर्शन, ज्योतिष-मन्त्र-वास्तु-शिल्प गणितशास्त्र , मूल-नियुक्ति-भाष्य आदि आगम-आगमोतर साहित्य का तलस्पर्शी गहन अध्ययन किया| आध्यत्मगुरु आचार्य विजय जनकचन्द्र सुरिश्वर्जी की निश्रा में रहकर ध्यान-साधना एवं अध्य्तम क्षेत्र के दुष्कर आत्मीय रहस्यों का अनावरित करने का सफल पुरुषार्थ किया|
मुनि श्री चिदानंद विजयजी की अमेय प्रतिभा को नूतन आयाम देते हुए शान्तिदूत गच्छाधिपति आचार्य विजय नित्यानंद सुरिश्वर जी ने विजय वल्लभ साधना केंद्र, जैतपुरा (राजस्थान) की निर्मल धरा पर उन्हें “पंन्यास” पदवी से विभूषित किया| तत्वचिंतक पंन्यास चिदानंद विजयजी प्रखर प्रवचनकार है| वे गूढ़ विषयों को भी अत्यंत सरल रूप से समझाने की क्षमता रखते है| अरिहंत परमात्मा की वाणी को वे इतने ह्रदयस्पर्शी सूक्षम रूप से समझाते है जिससे जैन ही नहीं, अजैन भी सुनकर प्राभावित हो जाते है| उनकी व्याख्या शक्ति प्रभावोंत्पादक है| उनकी स्पष्टवादिता उनकी पहचान है| उनकी लेखनी भी माँ वागेश्वरी की कृपा प्रसाद है|
आचार्य विजय नित्यानंद सूरीजी द्वारा लिखित कई पुस्तकों का उन्होंने संपादन किया है| पंन्यास श्रीजी द्वारा लिखित ऐतिहासिक कृति – “महावीर पाट परंपरा” भी सवर्त्र अनुमोदनीय रचना सिद्ध हुई| श्री पार्श्वनाथ परमात्मा के १०८ प्रमुख तीर्थ स्थलों में गिना जाने वाला – श्री सेसली पार्श्वनाथ महातीर्थ का जिनोर्द्वर भी पंन्यास चिदानंद विजयजी के मार्गदर्शन में हो रहा है| गुरु प्रदत्त, संघ प्रदत्त जिस भी कार्य से वे जुड़ते है तो उसे अपनी बुद्धि, प्रतिभा के बल पर पूर्णता के शिखर पर पहुंचाते है| खुडाला, खीमेल, आदि इसके कई उदाहरण है| उनके आशीर्वाद से अनेकों जगह अंजनशलाका – प्रतिष्ठा एवं जिणोरद्वार संपन्न हुए एवं गतिमान है| छोटे छोटे संघों से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक- विविध क्षेत्रों में विचरण कर उन्होंने धर्म की महती प्रभावना की है| गुरुदेव की मुखाकृति अत्यंत सौम्य है| अनेक ललाट पर ज्ञान का तेज देदीप्यमान होता है एवं भक्तों को उनके नयनभिराम प्रसन्न वदन के दर्शन मात्र से तेजस्विता की अनुभूति होती है| वे अत्यंत हितभाषी है| उनकी वचन सिद्धि का प्रत्यक्ष अनुभव अनेकों शारावक-श्राविकाओं ने किया है| वे तत्वचिन्तक, प्रखर प्रवचनकार आदि विशेषणों से जाने जाते है|
आचार्य श्री चिदानंदसुरिश्वर्जी म.सा.के अब तक के चातुर्मास की सूचि
१९८४ – चौपाटी , मुंबई
१९८५ – भायखला – मुंबई
१९८६ – नवरंगपूरा, अहेमदबाद
१९८७ – पालडी, अहेम्दाबाद
१९८८ – भंदर गाँव
१९८९ – लुधियाना
१९९० – जालंधर
१९९१ – बेड़ा , राजस्थान
१९९२ – जोधपुर, राजस्थान
१९९३ – नागौर , राजस्थान
१९९४ – बीकानेर , राजस्थान
१९९५ – लुधियाना
१९९६ – बेड़ा , राजस्थान
१९९७ – सादड़ी , राजस्थान
१९९८ – चामुंडेरी , राजस्थान
१९९९ – पालीताणा , गुजरात
२००० – नाडोल , राजस्थान
२००१ – सूरत , गुजरात
२००२ – दादर, मुंबई
२००३ – दादाई , राजस्थान
२००४ – रूपनगर
२००५ – सादड़ी , राजस्थान
२००६ – बिरामी ढाणी , राजस्थान
२००७ – खुडाला , राजस्थान
२००८ – बीजोवा – राजस्थान
२००९ – बाली , राजस्थान
२०१० – कालाचौकी , मुंबई
२०११ – शिवपुरी
२०१२ – रूपनगर
२०१३ – वरकाणा , राजस्थान
२०१४ – सांचोडी , राजस्थान
२०१५ – सांडेराव , राजस्थान
२०१६ – मुंडारा , राजस्थान
२०१७ – विजय वल्लभ स्मारक
पंन्यास चिदानंद विजय जी बन गए
आचार्य श्री विजय चिदानंदसूरिश्वर्जी म.सा.

जेतपुरा : ज्येष्ठ सुदी 4 तदनुसार दिनांक 29 मई 2017 के शुभ दिन शांतिदूत गच्छाधिपति आचार्य विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी आदि श्रमण श्रमणीवृन्द एवं भारतभर से पधारे हज़ारों श्रावक श्राविकाओं की साक्षी में पंन्यास चिदानंद विजय जी को पंच परमेष्ठी के तृतीय पद – आचार्य पदवी से अलंकृत किया गया।
* भव्य प्रवेश महोत्सव :

विजय वल्लभ सूरि समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी, पंन्यास चिदानंद विजय जी, मुनिराज मोक्षानंद विजय जी, मुनि पद्मशील विजय जी, मुनि महानंद विजय जी, मुनि मोक्षेश विजय जी, मुनि तत्त्वानंद विजय जी, मुनि ज्ञानानंद विजय जी आदि श्रमण वृन्दो का सभा स्थल पर भव्यातिभव्य प्रवेश हुआ। गुरु वल्लभ के जयकारों से पूरी प्रवेश यात्रा गूंज उठी। आचार्य विजय नीति सूरि जी समुदायवर्ती प्रवर्तक श्री मणिप्रभ विजय जी आदि, एवं आचार्य विजय नीति सूरि जी समुदायवर्ती गोड़वाड़ दीपिका साध्वी ललितप्रभा श्री जी (लेहरा म. सा. ), साध्वी हर्षप्रभा श्री जी आदि एवं विजय वल्लभ सूरि समुदायवर्ती साध्वी पूर्णप्रज्ञा श्री जी आदि श्रमणी वृन्द भी इस ऐतिहासिक समारोह में उपस्थित रहे।
* गच्छाधिपति जी का उदबोधन :

गच्छाधिपति गुरुदेव ने अपने सुमधुर स्वर में मंगलाचरण क़िया। तत्पश्चात श्री ओम आचार्य जी एवं अशोक गेमावत जी ने गुरुभक्ति के स्वर बुलंद किये।
गच्छाधिपति गुरुदेव ने अपने उदबोधन में फरमाया – “पंन्यास श्री चिदानंद विजय जी हमारी वल्लभ वाटिका के महकते सन्त हैं। आज से 35 वर्ष पूर्व पहली बार संक्रांति श्रवण करने आये कपिल कुमार ने सच मे अपने जीवन की सम्यक क्रांति घटित की और संयम जीवन का संकल्प किया। पंन्यास जी का अनुशासन, उनकी निखालसता, उनकी प्रवचन शक्ति से आप सभी परिचित हैं। दीक्षा के समय उन्होंने अपनी माँ को वचन दिया था कि मैं तेरे दूध को कभी लज्जाउंगा नहीं, बल्कि इस पीली चादर की चमक को सदा ऊपर ही ऊपर लेकर जाऊंगा और सच में, आज दिन तक वो उस वचन को निभा रहे हैं। पंन्यास जी के जीवन का निर्माण करने वाले आचार्य विजय जनकचन्द्र सूरि जी और आचार्य विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी का भी अनंत उपकार है। पंन्यास जी मेरे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ शिष्य हैं और उन्हें आचार्य पदवी से अलंकृत करते हुए मुझे अतिशय आनंद की अनुभूति हो रही।”
* आचार्य पदवी प्रदान विधि :

आचार्य पदवी प्रदान की विधि के अंतर्गत गच्छाधिपति गुरुदेव ने मंगल मुहूर्त में शास्त्र वचनों का उच्चारण किया। मुनिराज श्री मोक्षानंद विजय जी ने 700 गाथायुक्त महाप्रभावक आगम – श्री नंदीसूत्र का श्रवण पंन्यास जी के कानों में कराया। देववन्दन, गुरुवंदन आदि क्रियाएं भी मांगलिक रूप से सम्पन्न हुई।
* बोलियों के मंगल लाभ :
सूरिमन्त्र प्रदान महोत्सव अंतर्गत कई बोलियां और चढ़ावे हुए –
• नूतन आचार्य श्रीजी को सबसे पहले कांबली ओढाने का लाभ उनके सांसारिक परिवार – श्री नत्थुमल दीवानचंद जी लिगा परिवार (ND Group), शिवपुरी – जयपुर – दिल्ली – लुधियाना वालों ने लिया।
• सभी साधु साध्वी जी भगवंतों को कांबली ओढाने का लाभ श्री बदामी बाई केवलचन्द जी तेलिसरा परिवार ने लिया।
• नूतन आचार्य श्री जी को सूरिमन्त्र का पट्ट वोहराने का लाभ श्री इंदरचंद जी राणावत की अध्यक्षता में कार्यरत श्री खुडाला जैन संघ, राजस्थान ने अर्जित किया।
• इसके अतिरिक्त नूतन आचार्य श्रीजी को स्थापनाचार्य जी, आसन, माला आदि वोहराने की भी बोली है जिसमें गुरुभक्तों ने बढ़चढ़कर भाग लिया।
• तपागच्छीय प्रवर समिति के कार्यवाहक एवं डहेलावाला समुदाय के गच्छाधिपतिआचार्य विजय अभयदेव सूरीश्वर जी ने पंन्यास श्री चिदानंद विजय जी की आचार्य पदवी निमित्त आशीर्वाद एवं अनुमोदना स्वरूप सोने से लिखा हुआ स्वर्णाक्षरी सूरिमंत्र भिजवाया। उसे नूतन आचार्य श्रीजी को अर्पित करने का लाभ फतेहचंद जी मिश्रीमल जी राणावत, बिजोवा (राज.) ने लिया।
* सूरिमन्त्र प्रदान :

