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श्वेताम्बर जैन समाज में शोक ,राष्ट्रसंत गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी म.सा. हमारे बीच नहीं रहे

श्वेताम्बर जैन समाज में शोक ,राष्ट्रसंत गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी म.सा. हमारे बीच नहीं रहे

“मधुकर”

जालोर : जिनशासन के शणगार हमारे अणगार प्रात: स्मरणीय, विश्व पूज्य दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरिश्वर्जी म.सा. के पट्टधर, त्रिस्तुतिक परंपरा के दैप्तियमान सूर्य , सुविशाल गच्छाधिपति आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरिश्वर्जी म.सा. १६ अप्रैल को अर्धरात्रि दी. १७ अप्रैल को सुबह १२.१५ बजे भांडवपूर तीर्थ (भीनमाल, राजस्थान) में कालधर्म हुए|उनके देवलोग गमन का समाचार जैसे जैसे लोगों को मिला, भांडवपुर तीर्थ(भीनमाल,राजस्थान) में भाविकों की भीड़ जुटती गई|

बचपन से ही संत पढ़ने से होश्यार थे, लेकिन पढ़ाई से अधीक मन उनका देव दर्शन और पूजन में था| आचार्य का जन्म गुजरात राज्य के बनासकांठा जिला और उसके थराद तालुका के पेपराल गाँव में सरूपचंद के घर पर हुआ और इनकी माता का नाम पार्वती बाई था| पार्वती देवी ने सात पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया, लेकिन एक पुत्र और एक पुत्री का निधन हो गया| पीछे छह पुत्रों में पांचवें पुत्र का नाम था पूनमचंद| पूनमचंद में माता पिता के संस्कार लघुवय में ही विरासत में मिले| पूनमचंद की उम्र कम थी| उस समय सरूपचंद भाई (पिता) का जेतडा के जागीरदार अखेराज के साथ लेनदेन को लेकर विवाद हो गया और जागीरदार ने उन पर बन्दुक दागी| जिसके बाद पिता का मन गाँव में रहने से उठ गया| बाद में दादा देवचंद भाई ने पेपराल से थराद में रहने का निर्णय लिया| थराद में भीमसिंह के परगने में रहे|थराद में आने के बाद पूनमचंद की प्रारंभिक अध्ययन गामठी स्कूल में हुआ| पूनमचंद पढ़ाई में होशियार थे, लेकिन उनका मन पढ़ाई में नहीं लगता था| जहाँ एक तरफ उनके पिता पूनमचंद और उनके भाई को अंग्रेजी अध्ययां के लिए भेजते थे, दूसरी तरफ पूनमचंद का मन संसार से विरक्त होने लगा| लघुवय में ही पूनमचंद को देव दर्शन जाने व संवत् २००४ में आचार्य यतींद्र सुरिश्वर का चातुर्मास हुआ| इस दौरान वे इनसे प्रभावित हुए और उनका मन धार्मिक शिक्षण की तरफ आकर्षित हुए| जिसके बाद वे आचार्य के पास नियमित जाना शुरू कर दिया|

दीक्षा से पूर्व की तस्वीर |

* ऐसा हुआ धार्मिक मार्ग प्रशस्त :

थराद में चातुर्मास के दौरान ही पूनमचंद आचार्य यतीन्द्र सूरीश्वरजी से आकर्षित हुए और वे नियमित उनके पास जाने लगे| आचार्य यतीन्द्र सुरिश्वर में पूनमचंद में तेजस्वी लक्षण देखे एवं भविष्य की एक ज्योति देखि| चातुर्मास पूर्ण हुआ तो उन्होंने थराद से धानेरा की ओर विहार किया| रास्ते में ही ड़ोडीसा गाँव आया| इस पर पूनमचंद के पिता सरूपचंद ने आचार्य से दर्शन लाभ के लिए विनंती की | जिस पर गुरुदेव भडाल से विहार कर ड़ोडीसा पहुंचे| यहाँ से पर आचार्य ने कोली ठाकोर को उपदेश दिया| यहीं आचार्य यतीन्द्र सुरिश्वर्जी पूनमचंद के पिता से मिले और उन्हें पूनमचंद में दिखे तेजस्वी लक्षणों से अवगत करवाया|

* परिवार से सांसारिक रूप में अंतिम मिलाप :

बाली पहुँचने के बाद आचार्यश्री ने पूनमचंद के धार्मिक अभ्यास पर विशेष ध्यान दिया| इस दौरान पूनमचंद ने लोचनादी कष्ट सहन किये| दीक्षा के लिए आचार्य यतिन्द्रसुरीजी ने पूनमचंद के पिता को कहा| इधर , पूनमचंद ने भी दीक्षा ग्रहण के लिए पत्र लिखा, जिसके बाद दीक्षा से पूर्व अंतिम बार अपने घर लौटे | माता-पिता,दादी एवं अन्य परिजनों से दीक्षा के लिए आज्ञा मांगी|

दीक्षा लेने के दौरान अपने परिवार के साथ |

* सियाणा में ली दीक्षा :

संवत् २०१० माघ शुक्ल ४ का दिन दीक्षा के लिए निर्णय हुआ| दीक्षा का स्थल सियाणा (जालोर) निर्धारित हुआ|पूनमचंद की दीक्षा के साथ जावरा (मध्यप्रदेश) निवासी कांतिलाल मेरुलाल धाडीवाल को भी दीक्षा देने का निर्णय हुआ|दीक्षा को लेकर सियाणा को सजाया गया| दीक्षा में थारद से उनके माता पिता, बड़े भाई शांतिलाल, छोटे भाई पोपटलाल एवं अन्य परिवारजन सियाणा आए| दीक्षा सियाणा गांव की पूर्व दिशा में प्रवाहित होती नदी के किनारे वृक्ष के नीचे राखी गयी| इसके बाद माता पिता को बुलाकर पूनमचंद को वोहाराने को कहा| माता पिता की आज्ञा के बाद सियाणा नगरजनों के ह्रदय आनंद से आपूरित बने| नामकरण विधि से पूनमचंद का नाम ” मुनिश्री जयंतविजयजी म.सा.” रखा गया|


* वात्सल्यता…..

२००९ में आये भूकंप के दौरान आचार्य विहार में थे, इस दौरान समस्त समुदाय के मुनि भगवंत एवं साध्वीवृंद की कुशलता के समाचार जानने के बाद शाम को ५ बजे बाद जलग्रहण किया था|

* साहित्य प्रेमी…..

हिंदी,गुजराती,संस्कृत प्राकृतादी भाषाओं में इनका समानाधिकार है| विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित इनकी पुस्ताकों की संख्या १०० से अधीक है| जिनमें भगवान महावीर ने क्या कहा? अरिहंतें शरणं पवंज्जामी आदि मुख्य तथा अजोड है|

* सेवा भाव…….

उनका मानना था की भगवान महावीर भी अपने जीवन के आयुष्य को एक क्षण को न ही कम कर सके और नाही एक क्षण आगे बढ़ा सके| इसलिए जब तक है तब तक सत्त रूप से सेवा कार्य चलें|

* विनयशीलता……

विनयशीलता को जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग मानते थे| उनका कहना था की विनयवान व्यक्ति का जीवन हरे-भरे बसंत ऋतू के सामान है, जिसे सभी पसंद करते है, जबकि विनय हीन व्यक्ति पतझड़ के सामान है|

* संयमशीलता……

क्रोध प्रतिशोध की भावना को तीव्र करता है| यह धर्म को भी नष्ट करता है| आग का दाग मिटाया जा सकता है, लेकिन क्रोध में कहे वचन का दिल पर लगा घाव मिटाना असंभव है|

* तप……..

उन्होंने तप को विशेष महत्तव दिया| वे मानते थे की तप से कर्मों का शमन होकर आत्मा परमात्मा स्वरुप को प्राप्त करती है|


ऐसे मिलती रही गुरुदेव को उपलब्धियां …..

  • दीक्षा उपरांत प्रथम चातुर्मास : आचार्य यतीन्द्र सुरिश्वर के सानिध्य में आहोर में सन १९५४ में |

  • उपाचार्य : वि.सं. २०१७ मोहनखेड़ा तीर्थ में आचार्य श्री यतीन्द्र सुरिश्वर द्वारा उपाचार्य घोषित किया गया|

  • आचार्य मनोनयन : वि.सं. २०३९ श्री कुलपाकजी तीर्थ |

  • आचार्य पद प्रदान : वि.सं. २०४० श्री भांडवपुर तीर्थ माघ सुदी १३, दिनांक १५ फ़रवरी १९८४ में गुरुदेव श्रीमद् राजेंद्र सुरिश्वर्जी के पष्ठम पट्टाधिपति के रूप में आचार्य जयंतसेनसुरिश्वर्जी म.सा. |

आचार्य पद ग्रहण करते हुए |
  • नवकार मंत्र की आराधना : सन १९६१ में निम्बाहेडा चातुर्मास से श्री नमस्कार महामंत्र की आराधना प्रारंभ करवाई, जो अब तक प्रत्येक चातुर्मास में अनवरत् चालू है|

  • भाषा ज्ञान : हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, मारवाड़ी, संस्कृत आदि विभिन्न भाषाओं का ज्ञान|

  • राष्ट्रसंत की पदवी : वि.सं. २०४७ सन १९९१ में जावरा (म.प्र.) में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रीय पति महामहिम डॉ. शंकरदयालजी शर्मा ने आपको “राष्ट्रसंत” की पदवी से सम्मानित किया|

  • लोकसंत पदालंकरण : वर्ष २०१६ में रतलाम के नवोदित तीर्थ जयंतसेन धाम में आयोजित चातुर्मास में १७ सितम्बर २०१६ को आर.एस.एस. के सहकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी के करकमलों से नगर के सर्वसमाजों की उपस्थिति में “लोकसंत” पदालंकरण प्रदान |

गच्छाधिपति आचार्य श्री विजय जयंतसेनसूरीस्वरजी म.सा. को “लोकसंत” की उपाधि से अलंकृत किया था|
  • शासन प्रभावक के कार्य : अब तक २०० से अधीक साधू-साध्वी दीक्षित हो चुके है| १९५ साधू-साध्वी वृन्द आपकी आज्ञा में देशभर में धर्म की उत्कुष्ट प्रभावना कर रहे है |इनके सानिध्य में करीब ५० पैदल यात्री संघो का आयोजन, उपधान तपों को सानिध्यता, १० हॉस्पिटल , ३ गौशाला, ५ स्कूल खोले गए , २० युवा जागृति शिविर लगाए गए| राज राजेंद्र प्रकाशन ट्रस्ट, गुरुराजेंद्र फाउंडेशन ट्रस्ट, गुरु राजेंद्र जनकल्याण ट्रस्ट आदि की स्थापना कर संचालन की जिम्मेदारी सुयोग्य को सौप दी है|

  • प्रतिष्ठाएं : अब तक २३५ जिनमंदिरों की स्वर्णिम प्राण प्रतिष्ठा हुई| २५० से अधीक गुरु मंदिरों का निर्माण सदुपदेश से हुआ|

  • जिणोरद्वार, तीर्थोद्वार आदि अनेक कार्य आपकी निश्रा में संपन्न हुए| भारत के गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्णाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडू, उड़ीसा,बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, पांडीचेरी आदि आपके विहार क्षेत्र रहे| आप आशु कवी और अतुल पुण्य के भण्डार थे|

कौन कहता गुरुदेव चले गए,

ये तो “मधुकर” की खुशबू है ,

आज यहाँ कल कही और फैलेगी

बस महेकती रही जिन शासन को……

गुरुदेव को कोटि कोटि वंदन ……!


**** राष्ट्रसंत की देह पंचतत्व में विलीन ****

मेंगलवा (जालोर) : राष्ट्रसंत विजय जयंतसेन सुरिश्वर्जी की देह मंगलवार को पंचतत्व में विलीन हो गई| देश के कोने-कोने से आये भक्तों ने राष्ट्रसंत विजय जयंतसेनसूरीश्वर्जी को नाम आँखों से विदाई दी| राष्ट्रसंत का देवलोकगमन रविवार को भांडवपुर जैन तीर्थ में ह्रदय गति रुक जाने से हो गया था| उनके अंतिम दर्शन के लिए भांडवपुर जैन तीर्थ पर भक्तों का हुजूम उमड़ा| विजय जयंतसेनसुरिश्वर्जी के भक्त देश के कोने-कोने में है, जिनमें प्रदेश के आलावा मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे प्रदेश भी शामिल थे| मंगलवार को भांडवपुर जैन तीर्थ में हजारों की संख्या में लोग राष्ट्रसंत विजय जयंतसेनसूरीजी महाराज को अंतिम विदाई देने के लिए पहुंचे|……………..More