
भीनमाल नगर की वंसुधरा पर निर्मित देश के प्रथम 72 जिनालय तीर्थ आज जिस भव्यातिभव्य रुप में सब के सामने है इसकी भी एक कहानी है, वर्ष 1991 में भीनमाल के बैंक रोड पर लुंकड परिवार द्वारा निर्मित हंजारी भवन से जुडे हुए श्री मनमोहन पार्श्वनाथ भगवान के जिनालय की प्रतिष्ठा के लिये गच्छाधिपति राष्ट्रसंत शिरोमणी आचार्य देवेश श्री हेमेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा का भीनमाल आगमन हुआ। इसी दौरान प्रतिष्ठा उपरान्त मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. को गुरुदेव की प्रेरणा से संकेत प्राप्त हुआ कि भीनमाल नगर में एक ऐसे भव्यतम महातीर्थ का निर्माण होना चाहिये जिसका कोई सानी न हो। अपने अंतःकरण की प्रेरणा को मुनिप्रवर ने चर्चा के दौरान बताया तो वहाँ उपस्थित श्री सुमेरमल जी लुंकड, सुआबाई लुंकड एवं रमेश जी लुंकड सहित लुंकड परिवार ने मुनिप्रवर की प्रेरणा को सर आखों पर ले कर इस स्वप्न को हकीकत में बदलने का बीडा पूरी निष्ठा और लगन से उठाया।
ज्योतिष एवं वास्तु के महारथी मुनिप्रवर ने जिनालय निर्माण हेतु योग्य भू-भाग का चयन किया। प्रारम्भिक चरण की कार्यवाही पूर्ण होने के बाद जिनालय निर्माण को भव्यता प्रदान करने हेतु रुप रेखा बनाई जाने लगी। मुनिप्रवर श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. मंदिर निर्माण के जिस उंचे लक्ष्य को लेकर अद्वितीय अप्रतिम भव्यता प्रदान करने के लिये कल्पना लोक के सागर में गहराई से मंथन कर रहे थे। लुंकड परिवार के पितृ पुरुष श्री सुमेरमल जी लुंकड और उनकी धर्मपत्नि श्रीमती सुआबाई लुंकड भी उतनी ही तन्मयता के साथ मजबूत आत्मविश्वास और दृड संकल्प के साथ हम कदम हो कर सच्चे गुरु भक्त होने का फर्ज पूरा कर रहे थे।
संवत 2053 वैशाख सुदी 14 दिनांक 2 मई 1996 का वह शुभ दिन वह शुभ घड़ी आई जब बड़े धुमधाम से इस महातीर्थ की नींव शिलान्यास के साथ रखी गई। अवसर था राजगढ़ निवासी मनीष कुमार महेन्द्र कुमार जी भंडारी के दीक्षा महोत्सव का आचार्य भंगवत श्री हेमेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आदि मुनि मंडल एवं साध्वी मंडल की शुभ निश्रा में भीनमाल नगर में दीक्षा महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया लुंकड परिवार के श्री सुमेरमल जी एवं सुआबाई लुंकड ने नव दीक्षित मुनिराज श्री रजतचन्द्रविजयजी म.सा. के धर्म माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त किया, इसी अवसर पर शुभ मूहूर्त में इस महातीर्थ का शिलान्यास बडे़ धूमधाम से सम्पन्न हुआ।
जैन धर्म के वर्तमान आगत और अनागत तीर्थकरों के आधार पर निर्मित भारत वर्ष के प्रथम 72 जिनालय में त्रिकाल चौविसी के तीर्थंकरों की प्रतिमाओं के साथ गणधर, गुरुदेव, एवं अधिष्ठायकों का दर्शन पूजन का लाभ एक साथ मिल सकेगा।
प्राकृतिक परिवेश में हरियाली से आच्छादित इस जिनालय में जो कि सर्वतोभद्र श्रीरेखा पर निर्मित है, सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है। सुंदर कलाकृतियों से परिपूर्ण यह जिनालय रणकपुर एवं देलवाडा मंदिर की याद दिलाता है।
देवयोग से 3 मार्च 2008 एवं 4 सितम्बर 2009 को लुंकड परिवार के बासा एवं माजियां सा का अचानक अंरिहत शरण हो गया। इसके बावजूद लुंकड परिवार ने मंदिर निर्माण पर कोई असर नहीं पडने दिया एवं श्री किशोरमलजी लुंकड, श्री माणकमलजी लुंकड एवं रमेशजी लुंकड ने बा सा एवं माजिया सा की नव निर्मित जिनालय की भव्य प्रतिष्ठा कराने की अधूरी इच्छा को पूरा करने में किसी प्रकार की कोई कसर बाकी नहीं रखी।
– मुनि ऋषभचंद्रविजयजी
श्री लक्ष्मीवल्लभ पार्श्वनाथ 72 जिनालय तीर्थ:
अतीत कालीन २४ तीर्थंकर वर्तमान कालीन २४ तीर्थंकर अनागत कालीन २४ तीर्थंकर
श्री केवलज्ञानीजी श्री ऋषभदेवजी श्री पद्मनाभस्वामीजी
श्री निर्वानिनाथजी श्री अजितनाथजी श्री सुरदेवस्वामीजी
श्री सागरनाथजी श्री संभवनाथजी श्री सुपार्श्वनाथजी
श्री महायषजी श्री अभिनंदनस्वामीजी श्री स्वयंप्रभस्वामीजी
श्री विमलप्रभजी श्री सुमतिनाथजी श्री सवार्नुभूतिस्वामीजी
श्री सवार्नुभतिस्वामीजी श्री पद्रमप्रभुस्वामीजी श्री देवश्रुतस्वामीजी
श्री श्रीधरस्वामीजी श्री सुपार्श्वनाथजी श्री उदयस्वामीजी
श्री दत्तस्वामीजी श्री चंद्रप्रभुस्वामीजी श्री पेठालस्वामीजी
श्री दामोदरस्वामीजी श्री सुविधिनाथजी श्री पोहिलस्वामीजी
श्री सुतेजाप्रभुजी श्री शीतलनाथजी श्री शतकीर्तिस्वामीजी
श्री स्वामीनाथजी श्री श्रेयांसनाथजी श्री सुव्रतनाथजी
श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी श्री वासुपूज्यस्वामीजी श्री अममनाथजी
श्री सुमतिनाथजी श्री विमलनाथजी श्री निशकशायस्वामीजी
श्री षीवगतिनाथजी श्री अनंतनाथजी श्री निशपुलाकस्वामीजी
श्री असत्यागस्वामीजी श्री धर्मनाथजी श्री निर्ममस्वामीजी
श्री नामिश्वरस्वामीजी श्री शांतिनाथजी श्री चित्रगुप्तस्वामीजी
श्री अनिलनाथजी श्री कुंथुनाथजी श्री समाधिनाथस्वामीजी
श्री यशोधरस्वामीजी श्री अरनाथजी श्री संवतस्वामीजी
श्री कृतार्थनाथजी श्री मल्लिनाथजी श्री यशोधरस्वामीजी
श्री जिनेश्वरस्वामीजी श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी श्री विजयस्वामीजी
श्री षुद्धमतिस्वामीजी श्री नमीनाथजी श्री मल्लीस्वामीजी
श्री शिवंकरस्वामीजी श्री नेमिनाथजी श्री देवजिनस्वामीजी
श्री स्यनन्दस्वामीजी श्री पार्श्वनाथजी श्री अन्नतवीर्यस्वामीजी
श्री संप्रतिस्वामीजी श्री वर्धमानस्वामीजी श्री भद्रंकरस्वामीजी
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