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श्री हमीरपुरा पार्श्वनाथ

 

श्री हमीरपुरा पार्श्वनाथ – श्री मीरपुर तीर्थ

 

वि.सं. ८०८ में हमीर द्वारा इस गाँव को बसाने का उल्लेख है| इसका हमीरपुर, हमीरगढ़ के नाम से भी उल्लेख मिलता है|लेकिन यह मंदिर इससे भी प्राचीन है| वि.सं. ८२१ में आचार्य श्री जाया नन्दसूरीश्वर्जी के सदुपदेश से मंत्रीश्वर श्री सामन्त, द्वारा इस मंदिर का जिणोरद्वार करवाने का उल्लेख है| यहाँ पर गम्बुजो, तोरणों व स्तंभों आदि पर की गयी शिल्पकला लगभग हजार वर्ष प्राचीन मानी जाती है| हो सकता है एक हजा वर्ष पूर्व जिणोरद्वार होकर शिल्पकला के नमूने स्तंभों आदि पर प्रस्तुत किये गये हो| सं. १३२८ में हस्तलिखित “शपतदिका” प्रश्स्ति में भी यहाँ के पल्लिवाल क्षेष्ठियो का उल्लेख आता है| किसी समय यह एक विराट नगरी रही होगी, ऐसा यहाँ इधर-उधर बिखरे अवशेषों आदि से अनुमान लगाया जाता है|

यहाँ की प्राचीन शिल्पकला देखते ही आबू-देलवाडा, कुम्भारिया का स्मरण हो आता है| यहाँ शिखर पर उत्कीर्ण कला तो आबू से भी निराली है| यह तीर्थ अपनी प्राचीनता, कला व अद्धितीय वातावरण में एकान्त स्थान पर होने के कारण अपना विशेष स्थान रखता है| प्रतिवर्ष पौष कृष्णा १०, चैत्री पूर्णिमा व कार्तिक पूर्णिमा को मेले लगते है|

तपागच्छीय श्री इन्द्रनन्दसूरीजी के पट्टधर श्री सौभाग्यनंदीसूरीजी ने यहीं पर वि.सं. १५७६ में श्री मौन एकादशी की कथा रची थी| “वर्ल्ड एनसाईक्लोपेडिया ऑफ़ आर्ट” में भी इस मंदिर का उल्लेख है|