श्री सेसली पार्श्वनाथ – सेसली
मीठ्डी नदी के तट पर बसा हुआ सेसली किसी समय वैभवशाली गाँव रहा होगा जो यहाँ पर स्तिथ प्राचीन शिखरबद्ध जिनालय की उपस्थिति से ज्ञात होता है|
श्वेत पाषण की, मन को आनंद देने वाली श्री पार्श्वनाथजी की सपरिकर पद्मासन ध्यानस्थ प्रतिमाजी मुलनायकजी के स्थान पर विराजमान है|
१२वि सदी में क्षेष्टि श्री मांडन संघवी ने लाखों रुपयों का शुभ खर्च कर भव्य शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाया| जिनालय में विराजमान करने के लिए लाठाडा के पास में लालराई गाँव से श्री पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमाजी को लाया गया| वि.सं. ११८७ आषाढ़ सूद ७ को शुभ दिन भट्टारक् श्री आनंदसूरी के हाथ से इस प्रतिमाजी को मुलनायकजी के पद पर बिराजमान किया गया| प्रतिमाजी अत्यंत प्रभावशाली होने से सेसली एक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ|
संवत् १२५२ में जिनालय का जिणोरद्वार हुआ है| संवत् १४९३ में प्रतिमाजी को कलात्मक परिकर से सुशोभित किया गया| संवत् २०२० में पुन: जिणोरद्वार हुआ है| आषाढ़ सूद १४ प्रतिष्ठा का दिन प्रतिवर्ष मनाया जाता है|
संवत् १६५५ में श्री प्रेम विजय कृत ३६५ पार्श्वजिन नाममाला में इस तीर्थ का उल्लेख हुआ है|
सूरत से आबू पर्वत छरी पालित यात्रा संघ में वि.सं. १७५५ में ज्ञान विमल सूरी रचित तीर्थमाला में “चेचलियो पार्श्वनाथ” की वंदना की गई है|
श्री शील विजय विचरित तिर्थमाला में संवत् १७४८ में इस तीर्थ को “छेछेली” संबोधित किया गया है|
श्री शान्तिनाथ मंदिर, सेवाड़ी के वि.सं. ११३७ के शिलालेख में छेछडीयाँ गाँव का उल्लेख है|
गोडवाड क्षेत्र में “छ” को “स” से भी पुकारते है| इस प्रकार छेछेली का सेसली नाम कारन हुआ|
यहाँ जैनों का एक भी घर नहीं है|वर्तमान समय में श्री मनमोहन पार्श्वनाथ जैन देवस्थान पेढ़ी बाली के अंतगर्त इस तीर्थ की व्यवस्था की जाती है|
प्रतिवर्ष कार्तिक पूनम व भादरव सूद १० के दिन यहाँ मेला भरता है|
