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श्री विजय चिंतामणि पार्श्वनाथ

 

श्री विजय चिंतामणि पार्श्वनाथ – मेंडतासिटी

 

मेंड़ता शहर पूर्व काल में मोदिनीपुर/मेंड़तापुर के नाम से प्रख्यात नगरी थी| जैनधर्म की यहाँ जाहोजलाली थी| मलधारी श्री अभयदेवसुरिजि म.सा. ने इस नगर में शासन प्रभावना के अनेक कार्य किये थे| यहाँ के हजारों ब्राह्मणों व कड्मड यक्ष को सूरिदेव ने प्रतिबोध किया था| पूज्य आचार्य भगवंत ने हजारों श्लोक प्रमाण स्वोपज्ञ “भवभावना” ग्रन्थ का निर्माण मेंड़ता व छत्रापल्ली में किया था|

सम्राट अकबर प्रतिबोधक जगदगुरु हीरविजयसूरीजी म.सा. सं. १६३९ में यहाँ पधारे थे| उस समय यहाँ का सुलतान जैन मंदिरों से टैक्स-कर लेता था| पू. आचार्य भगवंत ने सुलतान को प्रतिबोध किया और टैक्स दूर कराया|

यह नगरी पहले खूब आबाद थी| यहाँ के प्राचीन जिनालय व उपाश्रय इस बात के साक्षी है|

आज भी मेंड़ता में १४ भव्य जिनालय विधमान है| गाँव बाहर श्री विजय चिंतामणि पार्श्वनाथ का भव्य जिनालय है| सं १९८७ में संघ ने इस जिनालय का निर्माण कराया था| प्रतिमाजी पर १९९७ का लेख है|

सं. १३८७ में विचरित श्री रत्नशेखर कृत “प्राकृत द्याश्रय वृति” में मेंड़ता नगर के वैभव का वर्णन है|

महायोगी आनंदघन जी म.सा. की जन्मभूमि व स्वर्गवास भूमि यही है|

पद्मासन में रही हुई १९ इंच ऊँची व १५ इंच चौड़ी इस प्रतिमा के दर्शन से ह्रदय आनंद से भर जाता है|