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श्री विजयसेनसूरीश्वर्जी म.सा.
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नाडलाई गाँव के कर्माशाह सेठ की पत्नी कोडमदेवी ने स्वप्न में सिंह को देखा एवं शुभ दिवस – वि.सं. १६०४ फाल्गुन सूद १५ को शुभ मुहर्त में उच्च लक्षणों से युक्त एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया – जयसिंह| पहले पिता ने दीक्षा ली, फिर माता सहित स्वयं ने सं. १६१३ जेठ सूद ११ को दीक्षा ग्रहण की| इनका नाम रखा गया मुनि जयविमल|वि.सं. १६२८- आचार्य पद| वि.सं. १६३२ सूरत चातुर्मास में दिगंबर भट्टारक वादी भूषण को हराया एवं वि.सं. १६४२, पाटण चातुर्मास में खरतरगच्छ वालों के साथ १४ दिन तक शास्त्रार्थ करके विजय डंका बजाया|
वि.सं. १६४८ में ये एवं हीरसूरीजी दोनों चातुर्मास में रहे हुए थे, तब अकबर का संदेशा आया की – “शत्रुंजय पर्वत आपको भेट दिया जाता है एवं तीर्थ का कर भी माफ़ किया जाता है|” अब आप (जगदगुरु) अपने पट्टधर को यहाँ भेजें|” तब गुरु की आज्ञानुसार लाहोर पहुँचकर इन्होनें धर्मोपदेश देकर राजा को प्रभावित किया| सभा में रहे हुए कुछ इर्श्यालुओ द्वारा पूछाए गए प्रश्नों के चतुराई पूर्वक जवाब दिये| उसी राजसभा में हेमचंद्राचार्यजी द्वारा रचित “योगशास्त्र” के “नमोदुर्वाररागादी” पद से ७०० अर्थ बनाकर कहे| तब बादशाह ने इनको जगदगुरु के योग्य पट्टधर जानकर “सवाइहीर” का बिरूद दिया गया| वि.सं. १६७१ जेठ वद ११ सूर्योदय के समय चतुश्शरण का स्मरण करते हुए समाधिपूर्वक कालधर्म को प्राप्त हुए| उस जगह पर बादशाह ने स्तूप बनवाया एवं १० विघा जमीन भेंट दी गई| मुनिओ द्वारा और गृहस्तों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तररूप सर्वमान्य “सेन प्रश्न” रचा गया| गागर में सागर समान यह ग्रन्थ आज अतीव उपयोगी है| इसका आधार पाठ ही शास्त्र पाठ कहलाता है|
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