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श्री भिलडीया पार्श्वनाथ

 

श्री भीलडीया पार्श्वनाथ – भीलडीयाजी

 

जैन शास्त्रों में इसका प्राचीन नाम भीमपल्ली होने का उल्लेख आता है| परन्तु, इसका इतिहास मिलना कठिन सा है| प्रभु प्रतिमा अति ही प्राचीन व परमपूज्य श्री कपिल केवली के सुहस्ते प्रतिष्टित मानी जाती है| एक और कंवदंती के अनुसार सम्प्रति राजा के समय की भी मानी जाती है| एक कींवदंती के अनुसार श्री श्रेणिक कुमार ने एक रूपवती भीलडी कन्या से शादी की थी व उसके जात के नाम पर यह नगरी बसाई थी| कालांतर में यह नगरी त्रम्बावती के नाम से प्रसिद्ध हुई| कहा जाता है की उस समय यहाँ सवा सौ शिखरबद्ध मंदिर, सवा सौ कुँए, अनेकों बावडिया, सुन्दर बाजार एवं इस मंदिर के पश्चिम भाग में राजगद्दी भी थी| वह स्थान आज भी गद्दीस्थल के नाम से प्रसिद्ध है| विक्रम सं. १३१७ में ओश्वाल क्षेष्ठी श्री भुवनपाल शाह द्वारा इस  मंदिर के जिणोरद्वार करवाने का उल्लेख है|

विक्रम सं. १३४४ में क्षेष्ठी श्री लखमसिंघजी द्वारा यहाँ श्री अम्बिका देवी की मूर्ति प्रतिष्टित करवाने का भी उल्लेख मिलता है| उल्लेखो से प्रतीत होता है की यह नगरी (भीम्पल्ली)विक्रम की १४वि सदी में जलकर भस्म हुई थी, संभवत: अलाउदीन ने वि.सं.  १३५३ में पाटण शहर पर आक्रमण किया, उसी समय इस नगरी का भी विनाश किया होगा| कहा जाता है, आचार्य श्री सोमप्रभसूरीश्वरजी का उस समय यहाँ क्व्हातुर्मास था| उनको श्रुतज्ञान से ज्ञात हुआ की इस नगरी का विनाश जल्दी होनेवाला है| यह जानकार आचार्यदेव व श्रावाकगन प्रथम कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को ही चौमासी प्रतिक्रमण करके नगर छोड़कर राधनपुर चले गए| जली हुई इटे, राख, कोयले आदि आज भी यहाँ पर भूगर्भ से जगह-जगह प्राप्त होते है|

यह प्रतिमा भी श्री कपिल केवली मुनि के हाथो प्रतिष्टित मानी जाने के कारण यहाँ की महँ विशेषता है| विक्रम की सोलहवीं शताब्दी में भीमपल्ली गच्छ की स्थापना इसी तीर्थ शेत्र पर हुई बताई जाती है| कहा जाता है भीलडीया गाँव पुन: बसने के पूर्व सरियद गाँव के श्रावकों ने इस प्रभु प्रतिमा को अपने गाँव ले जाने का प्रयत्न किया था| उसस समय यह मंदिर विनाश हुए गाँव के भयंकर में थी| श्रावकों ने प्रतिमा उथापण करके दरवाजे के बाहर लाने का प्रयत्न किया लेकिन दैविक शक्ति से प्रतिमा ने विराट रूप धारण किया व हजारों जंगली भवंरे मंडरने लगे|इस अतिशय को देखकर श्रावकों ने प्रतिमाजी को उसी जगह पर पुन: स्थापित कर दिया| ऐसी अनेक चमत्कारी घटनाएं घटने के वृतांत मिलते है व अभी भी यहाँ आने से श्रद्धालु भक्तजनों के मनोरथ पूर्ण होते है| प्रति वर्ष पौष कृष्ण १० के दिन मेला लगता है| इसके अतिरिक्त गाँव में एक और मंदिर है|