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श्री धर्मघोषसूरीश्वर्जी म.सा.
श्री धर्मघोषसूरीश्वर्जी म.सा.
वि.सं. १३२८ में आ. श्रीविधानंदसूरीश्वर्जी के छोटे भाई मुनि धर्मकीर्ति म.सा. की आचार्य पदवी हुई एवं आचार्य श्री धर्मघोषसूरीश्वर्जी म.सा. के नाम से प्रसिद्ध हुए| इनके उपदेश से गिरिराज पर ५२ जिनालयों का निर्माण हुआ| एक बार प्रभास पाटन के समुद्रतट पर रहकर “मंत्रमय समुद्रस्तोत्र” बनाया, तब समुद्र में अचानक भरती आई एवं अंदर रहे हुए अनमोल रत्न बाहर निकलकर इनके चरणों के बाजू में ढेर होने लगे| यह सब देखकर लोग नतमस्तक हो गए|
एक बार इनको अत्यंत जहरीले सर्प ने काटा, तब सकल संघ शोकमग्र बन गया| परिस्थिति देखकर आचार्यश्री ने कहा – “कल सुबह नगर के पूर्व दिशा से लकड़हारा काष्ठ का भारा लेकर आएगा, जिसमें से “विषहरिणी वेल” मिलेगी| उसे सुंठ के साथ घिसकर घाव पर लगा देना| ठीक वैसा ही करने पर आचार्यश्री स्वस्थ हो गये एवं आजीवन ६ विगई का त्याग किया| उज्जैन में योगी के उपसर्ग को एवं गोधरा में शाकिनियों के उपद्रव को शांत किया| मंत्री के वचनों के प्रतिकार रूप इन्होनें एक ही रात्री में आठ यमकवाली “जयऋषभ” पद से शुरू होती स्तुति दीवार पर लिखकर मंत्री को प्रतिबोधित किया| वि.सं. १३५७ में स्वर्गवासी हुए|
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