श्री कुकडेश्वर पार्श्वनाथ – मंदसोर
मध्य प्रदेश के मंदसोर जिले में कुकडेश्वर गांव में श्री कुकडेश्वर पार्श्वनाथ का भव्य तीर्थ है| नीमच के समीप में आया हुआ यह तीर्थ १०४० वर्ष जितना प्राचीन है| वर्तमान में बिराजमान प्रतिमाजी पर वि.सं. १६७६ का शिलालेख है|
कुकुडेश्वर तीर्थ के निर्माण के पीछे रहस्यभरी कथा छिपी हुई है|
पूर्वापाजित अशाता वेदनीय कर्म के उदय के कारण एक दत्त नाम के ब्रह्माण को भयानक कोढ़ रोग हो गया| कोढ़ की असाहय वेदना के कारण वह एक बार तो आत्महत्या के लिए तैयार हो गया… परन्तु किसी चारण मुनि के दर्शन वंदन से उसके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन आ गया | कर्म विज्ञान के बोध से उसे बोधि बीज की प्राप्ति हुई और वह एक श्रधावंत श्रावक बन गया|
एक बार नगर बाहर श्री गुणसागर केवली भगवंत का आगमन हुआ| केवली भगवंत के आगमन से दत्त का मन-मयूर नाच उठा| वह केवली भगवंत के दर्शनार्थ उधान में पहुँच गया| केवली भगवंत के मुख से भव-निस्तारिणी धर्म-देशना का श्रवण किया| जिसके फलस्वरूप उसकी वैराग्य भावना और दृढ़ बनी| उसने केवली भगवंत को अपना भावी पुछा| केवली भगवंत ने कहा “हे दत्त ! तुम्हारे आयुष्य का बंध हो चूका है, अत: एक बार तो तुझे तिर्यच गति में जाना पडेगा| यहाँ से सम्यकत्व का वामन कर तू राजपुर नगर में रोहित के घर में मुर्गे के रूप में पैदा होगा| परन्तु कुछ समय बाद ही जैन मुनि के दर्शन के प्रभाव से तुझे जातिस्मरण ज्ञान होगा| उस ज्ञान के कारण तुझे अपनी भूलों का स्पष्ट भान होगा, फलस्वरूप तुम्हारे अंतरमन में अपने किये हुए पापों के प्रति तीव्र पश्चाताप भाव जागेगा| इस पश्चाताप की आग में तुम्हारी आत्मा विशुद्ध बनेगी और अंत में अनशन व्रत का स्वीकार कर तुम इश्वर नाम के राजा बनोगे| उस भव में पार्श्वनाथ प्रभु के समागम से पुन: जाती स्मरण ज्ञान प्राप्त होगा…तुम्हारी आत्मा में बोधिबीज का वपन होगा और क्रमश: उत्तरोंतर आत्म विकास के पथ पर आगे बढोगे |
केवली भगवंत ने जो बात कहीं, वे अक्षरश: सत्य सिद्ध हुई| दत्त मरकर मुर्गे के रूप में पैदा हुआ और वहां चारण मुनि के दर्शन से उसके जीवन में परिवर्तन आया| अंत में अनशन व्रत के प्रभाव से वह मुर्गा इश्वर राजा के रूप में पैदा हुआ|
काल के प्रवाह में वह तीर्थ तो लुप्त हो गया परन्तु कुकुटेश्वर गाँव में आज भी कुकुटेश्वर पार्श्वनाथ की भव्य जिन प्रतिमा उस प्राचीन इतिहास को याद कराती है|
