श्री कल्हारा पार्श्वनाथ – भरूच
भरूच शहर की श्रीमाली पोल में क्लहारा पार्श्वनाथ प्रभु का प्राचीन जिनालय है|
श्री “जगचिंतामनी” चैत्यवंदन में “भरूअच्चही मुनिसुव्व्यम” के पाठ से इस नगर की प्राचीनता सिद्ध होती है|
मुनिसुव्रत स्वामी प्रभु के समय में भरूच में अश्वमेघ यज्ञ में होमने हेतु एक घोडा तैयार किया था| प्रभु के उपदेश से उस घोड़े ने सम्यकत्व प्राप्त किया| शुभ भाव में मरकर वह घोडा देव बना| उस देव ने अपने उपकारी प्रभु का चैत्य बनाकर “अश्वाबोध तीर्थ” का निर्माण कराया|
नवकार मन्त्र के श्रवण से समडी मरकर सिंहल द्वीप के सिंहल राजा की पुत्री सुदर्शना बनी| उसने “अश्वाबोध तीर्थ” का उद्धार कराया और उसका “शकूनिक-विहार” नाम दिया|
अंबड मंत्री ने ३२ लाख सोना महोर का सद्व्यय कर उस काष्ठमय मंदिर को पाषणमय बनाया| कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्रचार्यजी भगवंत के वरद हस्तों से प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई | यहाँ पर उतारी गई कुमारपाल महाराजा की आरती जगमशुर हो गई|
मुस्लिम काल में अनेक मंदिर ध्वस्त हो गए थे| ये कल्हारा पार्श्वनाथ फने रहित ३५ इंच व २९ इंच चौड़े श्वेत वर्णीय है|
