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Tithi & Pachkhan Schedule 📅

श्री अचलगढ़ तीर्थ

 

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मंदिर का दृश्य|

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मुलनायक भगवान

श्री आदिनाथ भगवान, श्वेत वर्ण, धातु प्रतिमा, पद्मासनस्थ, (श्वे. मंदिर) |


 

प्राचीनता :

                          अचलगढ़ भी अर्बुदगिरी का अंग रहने के कारण इसकी प्राचीनता भी आबू तीर्थ के समान है| वर्तमान मंदिरों में अचलगढ़ की तलेटी के पास छोटी टेकरी पर श्री शांतिनाथ भगवान का मंदिर सबसे प्राचीन है, जो की श्री कुमारपाल राजा द्वारा निर्मित बताया जाता है| इसका उल्लेख “विविध तीर्थ कल्प” व “अबुर्धगिरी कल्प” में आता है, लेकिन कुमारपाल द्वारा श्री महावीर भगवान का मंदिर निर्मित करवाने का उल्लेख है| हो सकता है जिणोरद्वार के समय प्रतिमा परिवर्तित की गयी हो| पहाड़ के ऊँचे शिखर पर श्री आदिनाथ भगवान के जग विख्यात चौमुखी मंदिर का निर्माण राणकपुर तीर्थ के निर्माता शेठ श्री धरणशाह के बड़े भाई रत्नाशाह के पौत्र शूरवीर, दानवीर, एवं बादशाह गयासुधीन के प्रधान मंत्री अहेव्व सहसाशाह ने आचार्य श्री सुमतिसुरीजी से प्रेरणा पाकर उस वक़्त यहाँ के महाराजा श्री जगमाल से अनुमति लेकर करवाया था|

वि.सं. १५६६ फाल्गुण शुक्ला १० के दिन श्री आदिनाथ भगवान के विशालकाय (१२० मण) घातु प्रतिमा की प्रतिष्ठा आचार्य श्री जयकल्याणसूरीजी के सुहस्ते सुसंपन्न हुई थी| यह वर्णन “गुरु माला” आदि में उल्लिखित है| इसी मंदिर में पूर्व दिशा में विराजित श्री आदेश्वर भगवान व दक्षिण दिशा में विराजित श्री शांतिनाथ भगवान की प्रतिमाओं पर मेवाड़ के डूंगरपुर नरेश श्री सोमदास के प्रधान, ओसवाल शेष्टी श्री साल्हाशाह द्वारा आयोजित समारोह में वि.सं. १५१८ वैशाख कुष्ण ४ के लक्ष्मीसागरसूरीजी के सुहस्ते प्रतिष्ठा होने का उल्लेख है|

मुलनायक भगवान के दोनों बाजू खडगासन की प्रतिमाओं पर वि.सं. ११३४ के लेख उत्कीर्ण है, इन लेखों के अनुसार श्री मंजिल में सर्व धातु की सांचोर में श्री महावीर भगवान के मंदिर के लिए यह प्रतिमाए बनी थी| इस मंदिर के दूसरी मंजिल में सर्व धातु की चौमुख प्रतिमाजी विराजित है, जिनमे पूर्व दिशा में विराजित प्रतिमा अलौकिक मुद्रा में अत्यंत सुन्दर व प्रभावशाली है| इस पर कोई लेख उत्कीर्ण नहीं है| यह प्रतिमा लगभग २१०० वर्ष प्राचीन मानी जाती है| संभवत: यह प्रतिमा पाहिले मुलनायक रही होगी | अत: यहाँ भी देलवाड़ा की भांति प्राचीन मंदिर रह होंगे|


 

परिचय :

                      यहाँ पर धातु की कुल १८ प्रतिमाए है व उनका वतन १४४४ मन कहा जाता है| इन प्रतिमाओं की चमक व् वर्ण से प्रेरित होता है की इनमे सोने का अंश ज्यादा है|इतनी विशालकाय धातु की प्रतिमाएं अन्यत्र नहीं है| इन प्रतिमाओं का डूंगरपुर के कारीगरों द्वारा बनाया माना जाता है| राजा कुंभा द्वारा वि.सं. १५०९ में निर्मित इस दुर्ग में विध्वंस महल भी है| आबू के योगिराज विजय शान्तिसूरीश्वर्जी की अंतिम तपोभूमि व स्वर्ग भूमि भी यही है| यहाँ जंगलो में उन्होंने घोर तपस्या की थी| मुख्य मंदिर के पास एक कमरा है, जहाँ प्राय: वे रहा करते थे| उनके अनेकों राजा अनुनायी थे|

श्री पुडल तिर्थोद्वारक आत्मानुरागी स्वामी श्री रिखबदासजी द्वारा रचित “आबू के योगिराज” पुस्तक में अनेको चमत्कारिक व् अलौकिक घटनाओं का आँखों देखा वर्णन है| उनमे एक वर्णन यह भी है की एक वक़्त योगिराज अचलगढ़ विराजते थे, जब स्वामीजी भी पास थे| २२ रजवाड़ो के नरेश व् राजकुमार आदि सिरोही के राजकुमार की शादी करके दर्शनार्थ आये| दरवाजा बंद था| सारे राजा व राजकुमार दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे| ज्यो ही दरवाजा खुला, सारे के सारे गुरुदेव के चरणों में साष्टांग नमस्कार करने लगे| सब सजेधजे होकर भी उन्हें अपने वस्त्रो का भान न रहा, इतनी भक्ति थी उनमे| स्वामीजी लिखते है की उस वक़्त का दृश्य फोटो लेने योग्य था, परन्तु कैमरा नहीं था| गुरुदेव ने अनेकों राजाओं से शिकार व् मॉस मंदिर का त्याग करवाया था|