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श्री विधाचंद्रसूरीश्वर्जी म.सा.
श्री विधाचंद्रसूरीश्वर्जी म.सा. – पथिक
आपका जन्म जोधपुर में १८५७ में हुआ| पिता का नाम गिरिधरसिंह और माता का नाम सुन्दरबाई था| ये राठोड वंश के थे| इनका नाम बहादुर सिंह रखा गया| प्राथमिक शिक्षण की अवस्था में ही माता-पिता का देहांत हो गया| इस कारण नीमच में उनके चाचा के पास रहने लगे| चाचा किसी काम के सिलसिले में चल्दू गांव जा रहे थे, साथ में बहादुर सिंह को भी ले लिया| चल्दु में अचानक मुनिराज श्री लक्ष्मीविजयजी मिल गए| उनसे परिचय हुआ| बहादुरसिंह की तेजस्विता को देखकर चाचा को उपदेश दिया और कहा की यह बालक होनहार है, मुनि बनेगा तो भविष्य सुधर जाएगा| चाचाजी को भी बात समझ में आई, उन्होंने बहादुर सिंह को मुनिराज के साथ भेजने का निश्चय किया|
उपाध्याय श्री मोहनविजयजी म.सा. मन्दसौर के “राजेंद्रविलास” नामक उपाश्रय में बिराजमान थे| लक्ष्मीविजयजी ने बालक को मंदसौर आने को कहा| मुनिराज लक्ष्मीविजयजी भी मंदसौर पहुंचे | वहां चाचा ने उपाध्याय श्री मोहनविजयजी की वाणी आचार आदि देखकर बहादुर सिंह को गुरु महाराज के चरणों में सौपने का निर्णय किया| वि.सं. १९७३ उपाध्याय श्रे मोहनविजयजी ने बहादुरसिंहजी का नाम बदलकर प्रभुलाल रख दिया, फिर सेठ हंजारिमल ने उनकी सब व्यवस्था की| प्रभुलाल ने भी अध्ययन शुरू किया| कुछ वर्षों तक पू. यतीन्द्र विजयजी के साथ रहे और अच्छी तरह अध्ययन किया| वि.सं. १९७९ में भूपेन्द्रसूरीश्वर्जी का पाटोत्सव जावरा में हो रहा था, तब यतीन्द्रविजयजी लक्ष्मीविजयजी भी प्रभुलाल लो लेकर वहां पहुंचे| सब प्रकार से अच्छी तरह योग्य जानकार प्रभुलाल को माघ सुदी ११ संवत् १९७९ के शुभदिन दीक्षा दी और विधाविजयजी नाम रखा|
अल्पकाल में ही अध्ययन सर्जन में निपुण बन गए| वे काव्य रचना, स्तवन, ध्यान साधना आदि में दक्ष थे| पू. यतीन्द्रसूरीश्वर्जी का स्वास्थ्य भी बिगड़ता जा रहा था, तब भदरवा सूद ११ संवत् २०१६ को सभी प्रतिनिधियों के समक्ष सभी श्रमण-श्रमणी तथा श्रावक-श्राविकाओं को विधाविजयजी की आज्ञा में ही रहना और जिनशासन-गुरुगच्छ की शोभा बढ़ाना इस प्रकार निर्णय लिया| सभी साधु- साध्वी मुनिराज विधाविजयजी भावी आचार्य की आज्ञा में रहे|
आचार्य पद प्रदान मोहत्सव मोहनखेड़ा तीर्थ ,इ आयोजित कर सं. २०२० फागुन शुक्ला तृतीय ता. १६-२-२०६४ को आचार्य पद से सुशोभित किये गए| अनेक संघ, उपधान, प्रतिष्ठा, अंजनशलाका आदि करवाई और कई दीक्षाएं भी दी| शिष्यों में प्रथम शिष्य में प्रथम शिष्य मुनिराज रामचंद्र विजयजी इत्यादि ११ शिष्य हुए| इनमे ८वे शिष्य मुनिराज श्री जयानन्द विजयजी है| मोहनखेड़ा तीर्थ की पुन: प्रतिष्ठा इनके करकमलों से हुई तीर्थ विकास के लिए अनेक कार्य करवाए| उनका स्वर्गवास आषाढ़ शुक्ला ७ संवत् २०३९ को मोहनखेड़ा तीर्थ में हुआ|
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