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श्री हीरविजयसूरीश्वर्जी म.सा.
श्री हीरविजयसूरीश्वर्जी म.सा.
इनका जीवन परिचय बताना यानी मेरु पर्वत को तराजू में तोलने के बराबर| फिर भी आंशिक रूप से यहाँ वर्णन कर रहे है| इनका जन्म सं. १५८३ मगसर सूद – ९ को पालनपुर में हुआ था| नाम-हीरजी, पिता का नाम-कुंवरजी सेठ, माता का नाम -नाथी बाई| इनके ३ भाई और ३ बहने थी|समय जाते माता-पिता के देवलोक के बाद पाटण आकर रहे| भट्टारक श्री दानसूरीजी के संपर्क में आये| वैराग्य से अपने जीवन को अधिवासित कर सं. १५९६ कार्तिक वद २ के दिन दीक्षा ग्रहण की| इनका नाम रखा गया मुनि हीरहर्ष| बहुत कम समय में व्याकरण, सिद्धांत वैराग्य में निशांत बने हुए इनको विशेष अध्ययन के लिए दक्षिण देश में दौलताबाद भेजा गया| “चिंतामणि” वैराग्य न्याय के कठिन ग्रंथो का अभ्यास करके वापस पधारे| सं. १६१० में इनको आचार्य पद दिया गया|
इनके समय में संपूर्ण भारत में मुसलमानों का ही राज्य था| जिससे जैन शासन को, जिनप्रतिमाओं को, चतुर्विधसंघ को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पद रहा था |उस समय में इनको भी कैबार कैद करने के आदेश आने से महीनों तक गुप्त स्थान में रहना पड़ा| जैसे की कहा गया है-हर अंधेरी रात के बाद उजाला होता है, ठीक वैसे ही अकबर एवं इनके भावी मिलन के संकेत हुए| बादशाह अकबर द्वारा चंपाबाई की तपस्या का वरघोडा देखना, देखकर प्रभावित होना, परीक्षा करना, जिनेश्वर भगवान एवं हीरसूरीजी की महिमा सुनकर मिलने की इच्छा होना वैराग्य सब कुछ होने के बाद श्रावकों द्वारा इनको फरमान भेजा गया की “बादशाह अकबर आपसे मिलना चाहते है|” शासन प्रभावना जानकर एवं रात्री में देवी संकेतानुसार तुरंत दिल्ही की तरफ विहार किया| शाही अश्व, गज, पालखी वैराग्य को भी ठुकराकर पैदल चलकर आने से अकबर अति प्राभावित हुआ| दरबार में प्रवेश करते समय गलीचे पर नहीं चलने के कारण बताये| तब गलीचे के नीचे चींटियों के झुंड को देखकर अकबर आश्चर्यचकित हो गया|
एक बार एक प्रहर तक इनके मुख से धर्म-श्रवण करने के बाद अकबर ने कहा “हमारे कहने पर आपश्री इतना उग्रविहार करके आए, पर आप हमारी कोई भेट भी नहीं स्वीकारते|” उचित अवसर जानकर पुरे देश में पर्युषण के आठ दिन “आमारी” का उपदेश देने से अकबर ने ४ दिन अपनी ओर से बढ़ाकर कुल १२ दिवस तक अमारि की घोषणा की| पशुओ को मुक्त कराये, कैदियों को रिहा किया, तालाब में से मछलियों को पकड़ना बंद कराया, रोज ५०० चिड़ियाओं की हत्या का भी निषेध करने पर चतुर्विध संघ ने अन्न-पानी का त्याग किया, माताओं ने अपने बच्चों को दूध पिलाना तक छोड़ दिया| इन परिस्तिथियों ने उन्हें औषध लेने को मजबूर किया, परन्तु काल का प्रवाह उल्टा चल रहा था| वि.सं. १६५२ भादरव सूद ११ को ६९ वर्ष की उम्र में समता एवं समाधिपूर्वक स्वर्गवासी हुए| इन्होनें जीवन में ८१ अट्टम, २२५ छठ, ३६ उपवास, २००० आयमबिल, २००० नीवी, २० बार २० स्थानक आराधना, जिसमें ४०० आयंबिल एवं ४०० चउत्थभत्त(उपवास) वैराग्य कई तपसाएं की| इनके द्वारा शांतिनाथ रस, मृगावती चरित्र, जंबूद्वीप प्रग्यती टिका वि. की रचना हुई|
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