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श्री विजयदानसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री विजयदानसूरीश्वर्जी म.सा.

 

वि.सं. १५५३ में जामला नगर में करमिया गोत्र के विशा ओसवाल शा. जगमाल की पत्नी सूर्यादेवी भ्रमादे की कुक्षी में इनका जन्म हुआ| सं. १५६२ में दीक्षा ग्रहणकर श्री आनंदविमलसूरीजी के शिष्य मुनि उदयधर्म के नाम से जाहिर हुए| सं. १५८७ में सिरोही में आचार्यपद एवं गच्छनायक पद-नाम श्री विजयदानसूरीजी शत्रुंजय के सोलहवें उद्धार में उपस्तिथ थे|

गुरु द्वारा किये गए क्रियोद्वार के बाद आजीवन ५ विगई (घी सिवाय) का त्याग किया| इनके उपदेश से प्रभावित मंत्री गलराज ने सं. १६१९-२० में बादशाह को समझकर ६ महीने तक श्री शत्रुंजय तीर्थ को करमुक्त करवाया था और मंत्री ने प्रत्येक संघ में आमंत्रण पत्रिका लिखकर संघपति बन करके तीर्थोधिराज का छ:री पालित संघ निकाला था| गिरनार वैराग्य तीर्थो के जिणोरद्वार भी इनके उपदेश से हुए थे| ववी.सं. १६२२ वडली में इनका देवलोक गमन हुआ|