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Tithi & Pachkhan Schedule 📅

श्री जगच्चंद्रसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री जगच्चंद्रसूरीश्वर्जी म.सा.

 

इनके समय में शिथिलता का प्रभाव एवं प्रचार अत्यधिक प्रमाण में होने से मेवाड़ में संवेगी, सुद्धाचार धारक पं. देवभद्रजी की उपसंपदा स्वीकार कर दोनों ने मिलकर क्रियोद्वार किया एवं मर्यादा पट्टक बनवाए गए| अनेक गच्छ के मुनिभगवंतो ने इस क्रियोद्वार को स्वीकार किया| गुरुश्री मणिरत्नसूरीजी के स्वर्गवास के बाद इन्होनें आयंबिल तप ही किया एवं सोमप्रभसूरीजी की सेवा में रहे| ये आयड नगर के नदी किनारे जाकर आतापना लेकर ध्यान करते| तप-ध्यान से प्रभावित हुए मेवाड़ नरकेशरी राणा जैन्नसिंह दर्शनार्थ पधारे| तब तप के तेज से बनी हुई कांतिमयी काया एवं भव्य मुखारविन्द को देख सहजरूप से बोले – “गुरुदेव महा तपस्वी है|” और उस समय शिष्य परंपरा “तपागच्छ” रूप में प्रसिद्ध हुई| चितौड़ की राजसभा में ७ दिगंबरवादियों को हारने से राणा जैनसिंह ने “हीरा” नाम की उपमा से नवाजा| उस समय से हीरला आचार्य जगच्चंद्रसूरीजी नाम से विख्यात हुए| गुजरात के महामात्य वस्तुपाल एवं तेजपाल इनके उपासक थे| आचार्य जगच्चंद्रसूरीजी वि.सं. १२९५-९६ में स्वर्गवासी हुए|