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श्री सोमप्रभसूरीश्वर्जी म.सा.

 

श्री सोमप्रभसूरीजी म.सा.

 

महामंत्री जिनदेव जैन का पुत्र सर्वदेव और उसका पुत्र सोमदेव था| सोमदेव ने आचार्य श्री विजयसिंहसूरीश्वर्जी के पास दीक्षा ग्रहण कर, व्याकरण, काव्य, न्याय और आगमों का ठोस अध्ययन कर, गुरु के सानिध्य में आचार्य-पद प्राप्त किया| इन्होनें वि.सं. १२३८ में माह सूद ४ शनिवार को मात्रुकाचचतुविर्शती पट्ट(२४ भगवान की माता की मूर्ति) की प्रतिष्ठा की थी, जो आज भी पवित्र पावन श्री शंखेश्वर तीर्थ में पूजनीय है| इन्होनें “सिंदूर-प्रकर” की रचना की, जिसके दुसरे नाम “सूक्तमुक्तावली” और “सोमशतक” भी मिलते है| इन्होनें ही शतार्थ काव्य रचा, जिसमें एक ही श्लोक के भी अर्थ किये, जिसके कारण ये “शतार्थी” के नाम से प्रख्यात हुए| अन्य भी अनेक ग्रंथो की रचना करके वि.सं. १२८४ मं अंतिम चातुर्मास के दौरान ये स्वर्गवासी हुए|