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मुमुक्षु भंवरलालजी दोशी का भव्य दीक्षा मोहत्सव संपन्न

 

मुमुक्षु भंवरलालजी दोशी का भव्य दीक्षा मोहत्सव संपन्न

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अहमदाबाद – ३१/०५/२०१५  जिनशासन के इतिहास का यादगार दिन| जब राजनगर अमदाबाद मे संयम जहाजपे बैठकर एक धन कूबेरने अपनी सारी धन दौलत शानो शोकत|त्यागकर सच्चे जैन श्रमण भगवंत बनके संयम का त्याग का जिवदया का जयणाका अहिंसा परमो धर्मको स्वीकार किया| ऐसे भंवरलाल से “भव्यरत्न विजयजी “ बने मुनि भगवंत को कोटि कोटि वंदन……

दिल्ली के अरबपति व्यापारी भंवरलाल जैन दोशी रविवार को जैन संत भव्यरत्न विजयजी महाराज बन गए। दीक्षा से पहले अपनी करोड़ों की दौलत जनता को लुटाने के बाद रविवार सुबह हजारों मुमुक्षु व संतों की उपस्थिति में भंवरलाल ने संयम जहाज पर सवार होकर मोह व माया का त्याग किया।

भंवरलाल दोशी राजस्थान के सिरोही जिले के छोटे से गांव मंडार के हैं। वर्ष १९५६ की २६ मई को जन्मे दोशी ने वहां से निकलकर देश व दुनिया में ५०० करोड़ रुपये से भी अधिक का कारोबार फैलाया। इसके साथ ही वह समाजसेवा व धार्मिक आयोजनों से जुड़े रहे। दर्जनों समाजसेवी व धार्मिक संस्थाओं के प्रमुख होने की वजह से दोशी को जैन संतों के सानिध्य में रहने का मौका मिला।

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आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी के संपर्क में आकर त्यागा मोह

आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी के संपर्क में आने के बाद भंवर लाल ने भी माया मोह त्याग कर अध्यात्म में रम जाने का प्रण लिया। रविवार को अहमदाबाद एजुकेशन सोसायटी के प्रांगण में लाखों धर्मावलंबियों के बीच उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। सुबह छह बजे धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ दीक्षा विधि प्रारंभ हुई। करीब 11 बजे आचार्य गुणरत्न सूरीश्वरजी ने भंवरलाल का नामकरण भव्यरत्न विजयजी होने का एलान किया। कार्यक्रम में भाग लेने वाले अतिविशिष्ट लोगों की वीवीआइपी, वीआइपी, वीआइपी 1, 2 व 3 करके पांच श्रेणियां रखी गई थी।

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* वर्षो याद रहेगा यह वर्षीदान

भंवर लाल के भव्यरत्न विजयजी महाराज बनने से पहले अहमदाबाद में हुआ भव्य वर्षीदान महोत्सव वर्षों याद रहेगा। भंवर लाल ने इसमें नोट, सोने चांदी के सिक्के, फ्लैट की चाबी तक दान कर दी। वर्षीदान में हाथी, घोड़े, ऊंट, रथ देखते ही बन रहे थे। मुंबई, कच्छ व राजस्थान से पहुंचे कलाकार धार्मिक भजन और गीतों से श्रोताओं का मन मोह रहे थे। वहीं भंवर लाल दोनों हाथ से दौलत लुटा रहे थे।

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* माया त्याग अध्यात्म की मेहंदी रचाई

दीक्षा से पहले भंवर लाल दोशी ने माया मोह त्यााग दिया। जैन संतों की उपस्थिति में उन्होंने बाल त्यागे। दीक्षा के मौके पर उनके हाथों पर मेहंदी सजी थी। यह मेहंदी भी उनके गांव के पास सोजत से मंगाई गई थी। गुरु भगवान के सानिध्य में आने के बाद भंवर लाल का जीवन पूरा बदल गया था। उनकी दीक्षा के लिए परिवार वाले भी खुशी-खुशी तैयार हो गए।

* सब से बड़ा त्याग अहंकार का त्याग होता है

भंवरजी के लिए ऑफिस और बहार की दुनिया में इतना मान सम्मान था की उनके पहुंचते ही सारे लोग खड़े हो जाते थे आज वो गुणरत्न सुरीजी के १०८ वे शिष्य बने है अब उन्हें उनसे दीक्षा पर्याय में बड़े सभी साधुओ की पंक्ति में सबसे छोटे साधू के रूप जाना जायेगा और उन्हें अपनी उम्र से बड़े या छोटे सभी साधुओ को वंदन करना होगा कल तक उनके एक इशारे पर ३२ पकवान थाली में सजकर आ जाते थे अब उन्हें घर घर घूमकर अपने और अन्य साधुओ के लिए गोचरी लानी होगी कल्पना कीजिये ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में कोई आम करोड़पति की भाषा और व्यव्हार कैसा होगा, भवरलालजी ने बरसो पुरानी आदतो को और भौतिक सुखो ही नहीं त्यागा है उन्होंने विनय गुण को भी अंतर में उतारा है जिस ५५ वर्षो की उम्र में आदतो को बदलना ना मुमकिन माना
गया है उस उम्र में भवरलालजी त्याग की एक उत्तम मिसाल बने है ये गुरु कृपा से ही संभव हो सकता है।