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श्री स्तंभन पार्श्वनाथ

 

श्री स्तंभन पार्शवनाथ – खंभात तीर्थ

 

इसका प्राचीन नाम त्रम्बावती नगरी था| जैन शास्त्रानुसार इस प्रभाविक प्रभु प्रतिमा का इतिहास बहुत पुराना है| बीसवें तीर्थंकर के काल से लेकर अंतिम तीर्थंकर के काल तक यहाँ अनेक चमत्कारिक घटनाएं घटी है| तत्पश्चात वर्षो तक प्रतिमा लुप्त रही| विक्रम सं. ११११ में नवांगी टिकाकर श्री अभयदेवसूरीजी ने दैविक चेतना पाकर सेडी नदी के तट पर भक्तिभाव पूर्वक “जयतीहूअन स्तोत्र” की रचना की, जिससे अधिष्ठायक देव प्रसन्न हुई व यह अलौकिक चमत्कारी प्रतिमा वहीँ पर भूगर्भ से अनेक भक्तगणों के सम्मुख पुन: प्रकट हुई| वर्तमान मंदिर में स्तिथ एक शिला पर उत्कीर्ण लेख के अनुसार विक्रम सं. ११६५ में मोढवंशीय बेला क्षेष्टि की धर्मपत्नी बाई बीडदा ने श्री स्तंभन पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर का निर्माण करवाया था| विक्रम संवत् १३६० के आसपास श्री संघ द्वारा पुन: मंदिर का निर्माण बनवाकर उत्साहपूर्वक प्रतिमाजी को प्रतिष्टित करवाने का उल्लेख है|

कालांतर में समय समय पर अनेक जिणोरद्वार हुए| अंतिम जिणोरद्वार विक्रम संवत् १८८४ में हुआ व शासन सम्राट आचार्य श्री नेमीसूरीश्वर्जी के हस्ते प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

कहा जाता है की इसी प्रतिमा के न्हवं जल से श्री अभयदेवसूरीजी का देह निरोग हुआ था| यहाँ का इतिहास गौरवशाली और प्राचीन है| कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्राचार्य ने विक्रम सं. ११५० में यहीं पर दीक्षा ग्रहण कर शिक्षा प्रारम्भ की थी| कहा जाता है की उस समय यहाँ अनेक करोड़पति श्रावकों के घर थे, जिन्होनें सैकडो मंदिरों का निर्माण करवाया था| राजा श्री कुमारपाल में मंत्री श्री उदयन भी यहीं के थे, जिन्होनें उदयनवसही नामक मंदिर का निर्माण करवाया था| विक्रम सं. १२७७ में यहाँ के दण्डनायक श्री वास्तुपाल ने ताडपत्री पर अनेकों ग्रन्थ लिखवाये| यहाँ पर जगदगुरु श्री हीरविजयसूरीजी, श्रीव सोमसुन्दरसूरीजी, श्री विजयसेनसूरीजी आदि आचार्यो ने अनेको जिन मंदिरों की प्रतिष्ठा करवाई तथा अनेकों महत्त्वपूर्ण ग्रंथो की रचनाएं की| यहाँ सोनी तेजपाल, संघवी उदयकरण, श्री गांधीकुंवरजी, क्षेष्ठी रामजी आदि श्रावकों ने भी अनेक मंदिर बनवाये| यहाँ के दानवीर सेठ वाजिया, राजिया, श्री राम और पर्वत आदि क्षेष्ठियो ने दुष्काल में अनेकों दानशालाएं व भोजनशालाएं खुलवाई थी|

कविवीर श्री रिषभदासजी की भी यही जन्मभूमि है, जिन्होनें अनेकों रास ग्रंथो की रचना यहीं की थी| ये सारे तथ्य इस तीर्थ की प्राचीनता और महत्ता को सिद्ध करते है| प्रतिवर्ष फाल्गुण शुक्ल तृतीया को वार्षिकोत्सव मनाया जाता है|