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श्री नवलखा पार्श्वनाथ
श्री नवलखा पार्श्वनाथ – पाली
इसके प्राचीन नाम पल्लिका व पल्ली है| श्री सांडेराव तीर्थ के इतिहास से ज्ञात होता है की वि.सं. ९६९ में सांडेराव के मंदिर के जिणोरद्वार प्रसंगे प्रतिष्ठा मोहत्सव पर प्रकांड विद्धान आचार्य श्री यशोभद्रसूरीश्वर्जी द्वारा मांत्रिक शक्ति से पाली से घी मंगवाया गया हा, जिसका व्यापारी को पता नहीं लगा सका| पश्चात सांडेराव के श्रावकगण घी की लागत के रुपयों का भुगतान करने आये| परन्तु भाग्यशाली व्यापारी ने रूपया लेने से इनकार किया व उक्त शुभ काम के लिए अपनी अमूल्य लक्ष्मी का सदुपयोग होने के कारण अति ही प्रसन्नता पूर्वक अपने को कृतार्थ समझने लगा| घी के मूल्य की राशि नव लाख रुपयों से यहीं बनवाने की योजना बनाकर इस मंदिर का निर्माण किया गया, जो नवलखा मंदिर कहलाने लगा| तत्पश्चात इस मंदिर का जिणोरद्वार वि.सं. ११४४ में होने का उल्लेख है| मंदिर में कई प्रतिमाओं पर सं ११४४, सं. ११७९ व सं. १२०१ के लेखों में इस मंदिर में मुलनायक श्री महावीर भगवान रहने का उल्लेख है| वि.सं. १६८६ में हुए पुन: जिणोरद्वार के समय मुलनायक श्री महावीर स्वामी के स्थान पर श्री पार्श्वनाथ भगवान की यह प्रतिमा प्रतिष्ठत होने का उल्लेख है| प्रतिमाजी पर भी वि.सं. १६८६ का लेख उत्कीर्ण है| वि.सं. २०४१ में बावन जिनालय से युक्त नवलखा पार्श्वनाथ की प्रतिष्ठा पू. आ. श्री कैलाशसागरसूरीश्वर्जी म.सा. के वरद हस्तों से संपन्न हुई थी|
पल्लिवाल गच्छ का उत्पति स्थान यही है| इस गाँव के नाम पर ही पल्लिवाल ओसवाल नाम पड़ा| वि.सं. ९६९ में संड़ेरक गच्छचार्य श्री यशोभद्रसूरीश्वरजी को आचार्य पदवी से यहीं पर विभूषित किया गया था|प्रारम्भ से ही यह स्थान जाहोजलालीपूर्ण रहा| यहाँ के श्रावकों ने धर्म प्रभावना के अनेक कार्य किये, जो आज भी उनकी धर्मनिष्ठा की याद दिलाते है | प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल ३ के दिन ध्वजा चढ़ती है| भाखरी मंदिर पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन मेला भरता है|
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