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श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ
श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ – धोलका
धोलका नगर के पास, बाबला-खेडा रोड पर श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ का यह तीर्थ आया हुआ है| यह प्रतिमा ३५” ऊंची और २७” चोडी है| प्रभुजी के मस्तक पर नौ फने है| प्रभुजी अष्ट महाप्रातिचार्य से सुशोभीत है|
कलिकुंड पार्श्वनाथ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है| पार्श्वनाथ प्रभु के छद्मस्थकाल में इस तीर्थ का निर्माण हुआ था| भागवती दीक्षा अंगीकार करने के बाद प्रुथ्विकाल को पावन करते हुए पार्श्वप्रभु “कादंबरी” नाम के वन में पधारे| वहां “कुंड” नाम का बड़ा सरोवर था| सरोवर में सैकड़ो कमल खिले हुए थे| उस सरोवर के पास “कलि” नाम का पर्वत था| पार्श्वनाथ प्रभु उस सरोवर के तट पर कायोत्सर्ग ध्यान में खड़े हो जाए|
उसी समय वहां पर एक वन हाथी आया |वह प्रभु को स्थिर नजर से देखने लगा| प्रभु को देखते देखते अचानक उसे जाती स्मरण ज्ञान हो गया और चित्रपट की भांति उसे अपना पूर्व भव स्पष्ट दिखाई देने लगा|
“चम्पापुरी नगरी में एक वामन देह धारी बालक रहता था| बालक की उम्र बढ़ने लगी, परन्तु उसकी काय तो वैसी ही वामन रही| आसपास के युवकों के लिए वह मजाक का केंद्र बन गया| साथियो से परेशान हुआ वह बौना अपनी जीवन-लीला को समाप्त करने के लिए कलि नाम के पर्वत के शिखर पर चढ़ गया और आत्महत्या की तैयारी करने लगा| सद्दभाग्य से इसी बीच उसे, सद्गुरु का योग मिल गया| गुरु भगवंत ने उसे, देव दुर्लभ ऐसे जीवन की महत्ता समझाई| दुर्लभता से प्राप्त मानव जन्म को आत्महत्या कर बरबाद नहीं करना चाहिए| उस संयम की साधना द्वारा इस जीवन को सफल व् सार्थक बनाना चाहिए|
गुरु भगवंत की वाणी उस बौने के अन्तमर्ण को छु गई और आत्म हत्या के विचार को तिलांजलि देकर उसने गुरु चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया| संसारी मिटकर वह साधू हो गया| संयम धर्म का पालन करते हुए दिन पर दिन बीतने लगे|
एक दिन वे मुनि अपनी लघुकाय देह को देखकर ग्लानी युक्त हो गए| “ओहो ! मेरी संयम साधना इतनी ऊँची है, लेकिन मेरा देह कितना छोटा है| अच्छा हो, जन्म में मुझे बड़ा देह मिले |” बस, इस दुर्ध्यान की वेला में ही उन्होंने, अपने जन्म के आयुष्य का बंध कर लिया|
अपना “आयुष्य पूर्ण कर वे ही मुनि मरकर हाथी बन गए|”
अपने पूर्व भव का यह दृश्य उस हाथी की आँख के सामने मंडराने लगा|
उसने सोचा “अहो ! में दुर्लभ मानव भव को हार गया और इस पशु के भव में आ गया |”
इस प्रकार सोचते हुए उस हाथी का मन पश्चाताप से भर आया| उसे अपनी भूल अखरने लगी|
नए पाप कर्म का बंध न हो, इसके लिए वह सावधान हो गया और नवीन पुण्यबंध के लिए जागृत हो गया|
वह हाथी सरोवर में से अपनी सुंढ़ में पानी भरकर ले आया और सुने प्रभु के मस्तक पर जल का अभिषेक किया| उसके बाद सुंढ़ में कमल लाकर प्रभु के चरणों में कमल चढ़ाने लगा|
इधर दुसरे दिन करकुंड राजा को प्रभु के आगमन के समाचार मिले| वह राजा प्रभु को वंदन करने के लिए वहां आया, परन्तु प्रभु तो वहां से विहार कर चुके थे|
वह राजा हाथी के सौभाग्य की अनुमोदना करने लगा और अपने मंद भाग्य के लिए पश्चाताप करने लगा|
उसी समय राजा के समाधान के लिए किसी देव ने नौ हाथ प्रमाण पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा तैयार की| राजा ने वहां पर चैत्य का निर्माण किया| “कलि” नाम के पर्वत और “कुंड” नाम के सरोवर के कारण वह प्रतिमा | “कलिकुंड पार्श्वनाथ” के नाम से प्रख्यात हुई|
प्रभुभक्ति के फल स्वरुप वह मरुधर हाथी मरकर महधिर्क व्यंतर देव बना| कलिकुंड तीर्थ का अधिष्ठायक बनकर वह उस तीर्थ की महिमा फैलाने लगा|
कलिकुंड पार्श्वनाथ प्रभु के मूल तीर्थ तो आज विधमान नहीं है परन्तु भारत में अनेक जगह कलिकुंड पार्श्वनाथ के जिनबिंब है|
वर्तमान समय में धोलका के पास आया कलिकुंड पार्श्वनाथ का तीर्थ अत्यंत ही प्रसिद्द है|
भालापोल के आदिनाथ मंदिर के कलिकुंड पार्श्वनाथ बिराजमान थे| यह प्रतिमा लगभग २५०० वर्ष प्राचीन है | पू.पं. श्री राजेंद्रविजयजी म.सा. (बाद में आचार्य) की प्रेरणा व उपदेश से भोयंरे में रही इस प्रतिमा के नाम से नवीन मंदिर का निर्माण हुआ| और वि. सं. २०३८ फाल्गुन सूद ३ के दिन इस मंदिर की प्रतिष्ठा विधि संपन्न हुई|
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