

मुलनायक भगवान
श्री आदिनाथ भगवान, श्वेत वर्ण, धातु प्रतिमा, पद्मासनस्थ, (श्वे. मंदिर) |
प्राचीनता :
अचलगढ़ भी अर्बुदगिरी का अंग रहने के कारण इसकी प्राचीनता भी आबू तीर्थ के समान है| वर्तमान मंदिरों में अचलगढ़ की तलेटी के पास छोटी टेकरी पर श्री शांतिनाथ भगवान का मंदिर सबसे प्राचीन है, जो की श्री कुमारपाल राजा द्वारा निर्मित बताया जाता है| इसका उल्लेख “विविध तीर्थ कल्प” व “अबुर्धगिरी कल्प” में आता है, लेकिन कुमारपाल द्वारा श्री महावीर भगवान का मंदिर निर्मित करवाने का उल्लेख है| हो सकता है जिणोरद्वार के समय प्रतिमा परिवर्तित की गयी हो| पहाड़ के ऊँचे शिखर पर श्री आदिनाथ भगवान के जग विख्यात चौमुखी मंदिर का निर्माण राणकपुर तीर्थ के निर्माता शेठ श्री धरणशाह के बड़े भाई रत्नाशाह के पौत्र शूरवीर, दानवीर, एवं बादशाह गयासुधीन के प्रधान मंत्री अहेव्व सहसाशाह ने आचार्य श्री सुमतिसुरीजी से प्रेरणा पाकर उस वक़्त यहाँ के महाराजा श्री जगमाल से अनुमति लेकर करवाया था|
वि.सं. १५६६ फाल्गुण शुक्ला १० के दिन श्री आदिनाथ भगवान के विशालकाय (१२० मण) घातु प्रतिमा की प्रतिष्ठा आचार्य श्री जयकल्याणसूरीजी के सुहस्ते सुसंपन्न हुई थी| यह वर्णन “गुरु माला” आदि में उल्लिखित है| इसी मंदिर में पूर्व दिशा में विराजित श्री आदेश्वर भगवान व दक्षिण दिशा में विराजित श्री शांतिनाथ भगवान की प्रतिमाओं पर मेवाड़ के डूंगरपुर नरेश श्री सोमदास के प्रधान, ओसवाल शेष्टी श्री साल्हाशाह द्वारा आयोजित समारोह में वि.सं. १५१८ वैशाख कुष्ण ४ के लक्ष्मीसागरसूरीजी के सुहस्ते प्रतिष्ठा होने का उल्लेख है|
मुलनायक भगवान के दोनों बाजू खडगासन की प्रतिमाओं पर वि.सं. ११३४ के लेख उत्कीर्ण है, इन लेखों के अनुसार श्री मंजिल में सर्व धातु की सांचोर में श्री महावीर भगवान के मंदिर के लिए यह प्रतिमाए बनी थी| इस मंदिर के दूसरी मंजिल में सर्व धातु की चौमुख प्रतिमाजी विराजित है, जिनमे पूर्व दिशा में विराजित प्रतिमा अलौकिक मुद्रा में अत्यंत सुन्दर व प्रभावशाली है| इस पर कोई लेख उत्कीर्ण नहीं है| यह प्रतिमा लगभग २१०० वर्ष प्राचीन मानी जाती है| संभवत: यह प्रतिमा पाहिले मुलनायक रही होगी | अत: यहाँ भी देलवाड़ा की भांति प्राचीन मंदिर रह होंगे|
