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श्री वल्लभिपुर तीर्थ

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मंदिर का दृश्य |

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मुलनायक भगवान

श्री आदेश्वर भगवान,पद्मासनस्थ, श्वेत वर्ण, (श्वे. मंदिर)|


प्राचीनता :

                          श्री वल्लभिपुर का इतिहास प्राचीन है| इसका प्राचीन नाम विमलपुर था| मौर्यावंशी राजाओं की यह प्राचीन राजधानी थी| जिन्होंने सदियों तक यहाँ राज्य किया व् इस वंश के अनेको राजा जैन धर्म के अनुनायी थे| जैन ग्रंथो से पता लगता है की वीर नि. की १०वि शताब्दी में मौर्य वंश के राजा धर्मादित्य के पुत्र शिलादित्य ने “द्वाराशारनयचचक्रवाल” के रचयिता प्रकाण्ड तार्तिक शिरोमणि आचार्य मल्लवदीसूरीजी व् “शत्रुंजय महामय” के रचियता आचार्य श्री धनेश्वरसूरीजी का राज्य सभा में सम्मान किया था| उसी समय शिलादित्य राजा द्वारा शत्रुंजय तीर्थ का जिणोरद्वार करवाने का भी उल्लेख है| उस समय यहाँ ८४ जिन मंदिर विधमान थे|

वि.सं. ५११ में श्री देवधिरगणी क्षमाश्रमण व अन्य ५०० आचार्यो ने यही पर श्री संघ को एकत्रित कर जैन आगमों को प्रथम बार लिपिबद्ध किया था| वि.सं. ५८४ में यहाँ के मौर्य वंशी राजा ध्रुवसेन को उनके पुत्र की मृत्यु पर यहाँ विराजित चौथे कालकाचार्य ने उपदेश देकर पुत्र-शोक भुलाया था व राजा ने पुत्र की आत्मा के श्रमार्थ अनेकों जिनमन्दिर बनवाये थे| वि.सं. ६१० से ६२५ तक यहाँ गृहसेन प्रतापी राजा हुए उस समय यहाँ अनेकों जैन मंदिर थे जिनमे आदेश्वर भगवान का एक विशाल मंदिर था व आदेश्वर प्रभु की मनोहर प्रतिमा सफ़ेद स्फटिक की थी| यहाँ पर उस समय हस्तलिखित अनेको ग्रंथ थे, ऐसा श्री जिनभद्रगनि श्रमाश्रमण ने उल्लेख किया है| “विशेषावश्यकभाष्य” ग्रन्थ की रचना यही हुई थी|

वि.सं. ६७६ के आसपास चीनी यात्री श्री हुएनसांग याहन आये | उस समय यह तक विराट नगरी थी व अनेकों श्रावको के घर थे, जिनमें सैकड़ो करोड़पति श्रावक थे, ऐसा उल्लेख मिलता है| वि.सं. ८४५ के लगभग गुर्जरपति हम्मीर के समय इस नगरी का पतन हुआ व् यहाँ से अनेकों प्राचीन प्रतिमाएँ उस समय देवपतन व् श्रीमाल नगर ले जायी गयी|  अभी भी यहाँ, जहाँ-तहाँ, अनेकों प्राचीन भग्नावशेष प्राप्त होते रहते है| इस प्राचीन ऐतिहासिक तीर्थ का अंतिम उद्धार तिर्थोद्वारक आचार्य श्री नेमीसूरीश्वर्जी के हाथों हुआ|


 

परिचय :

                       कहा जाता है कीसी समय यह शत्रुंजय तीर्थ की तलेटी थी| जैन आगमों को प्रथम बार लिपिबद्ध यही किया था| शत्रुंजय महात्मय ग्रंथ की रचना आचार्य श्री धनेश्वरसूरीजी द्वारा यहीं की गयी थी| किसी समय यहाँ पर भारत का बड़ा विश्व-विधालय था| यहाँ पर धार्मिक उत्थान के अनेकों कार्य हुए| इसलिए यह स्थल धार्मिक दृष्टी से परम पवित्र स्थल माना जाता है|

मंदिर के नीचे भाग में देवर्धि श्रमाश्रमण आदि ५०० आचार्यो की प्रतिमाए दर्शनीय है| इसी परकोटे में विजयनेमीसूरीश्वर्जी महाराज का गुरु मंदिर है| गाँव में एक और पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर है| गाँव में एक और पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर है| प्रतिमाजी अति सुन्दर व् प्राचीन है|

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यहाँ पर देवधिगणी श्रमाश्रमण आदि ५०० आचार्यो की प्रतिमाए कलात्मक ढंग से बनायीं गयी है| ऐसा मंदिर भारत में अन्यत्र नहीं है|


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