

मुलनायक भगवान
श्री महावीर भगवान, श्वेत वर्ण, पद्मासनस्थ, (श्वे. मंदिर) |
प्राचीनता :
यह तीर्थ महावीर भगवान के समय का बताया जाता है| जैसे कहा है, “नाणा, दियाना, नान्दिया जीवित स्वामी वान्दिया”| मंदिर में प्राप्त वि.सं. १६५९ तक के शिलालेखों से प्रमाणित होता है की यह सदियों तक जाहोजलालीपूर्ण रहा| लेकिन नाणा कब बसा, इसका इतिहास मिलना कठिन है|
श्री महावीर भगवान के जीवन काल की प्रतिमा शायद जिणोरद्वार के समय बदली गयी होगी, ऐसा प्रतीत होता है| क्योंकि वर्तमान प्रतिमा पर वि.सं. १५०५ माघ कृष्ण ९ शनिवार को श्री शान्तिसूरीश्वर्जी द्वारा प्रतिशित किये जाने का लेख उत्कीर्ण है | लेकिन यह प्रतिमा भी बहुत ही प्रभावशाली है|
परिचय :
यह तीर्थ प्रभु वीर के समय का माना जाने के कारण इसकी महान विशेषता है| नानक्यागच्छ का उत्पति स्थान यही है| इस गच्छ की उत्पति वि. की बारहवी सदी से पूर्व हुई होगी, ऐसा उल्लेखो से ज्ञात होता है| यह बामनवाडा पंचतीर्थी का एक तीर्थ स्थान माना जाता है| अमरसिंह माया वीर राजा ने त्रिभुवन मंत्री के वंशज श्री नारायण मूता को नाणा गाँव भेट दिया था| नारायण ने एक साहराव नाम का अरट भगवान की पूजा सेवा के लिए मंदिर को भेट दिया था| उस समय उपकेशगच्छीय आचार्य श्री सिंहसूरी विधमान थे| शिलालेख पर वि.सं. १६५९ भादवा शुक्ल ७ का लेख उत्कीर्ण है| उक्त अरट अभी भी जैन संघ के अधीन है| प्रतिवर्ष जेठ वदी ६ को ध्वजा चढ़ाई जाती है|
वर्तमान में इसके तिरिक्त एक और मंदिर है |
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