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Tithi & Pachkhan Schedule 📅

आना

 

आना

 

                 भारत देश सभ्यता एवं धार्मिक परंपरा की दृष्टी से विश्व पटल पर अज भी शेष्ट एवं पथप्रदशर्क माना जाता है| देश की अनेक अमूल्य धरोहरों में राजस्थान की भागीदारी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है| राजस्थान का इतिहास शौर्य, साधना, धर्म परायणता और दानशीलता की गौरवमय गाशाओं से परिपूर्ण है| राजस्थान के पाली जिला अंतगर्त देसुरी तहसील में सुररम्य अरावली पर्वतमाला (खेतमलजी मगरी) की गोद में ब्राह्मी नदी के किनारे एक छोटा-सा सुन्दर गाँव बसा है “आना”|

 

भूतकाल में “आना” गाँव सोलंकी नरेश के वंशजो के अधीन रहा| सरदार समन्द बांध बनाते समय भींथडा महंतजी की जमीन बांध में लेने के एवज में मारवाड़ नरेश ने उन्हें “आना” गाँव दिया| स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आना, सारंग वास, सोनाणा और शौभावास इन चारों गावों को मिलाकर ग्राम पंचायत “आना” का गठन हुआ|

भौगोलिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के साथ-साथ धार्मिक दृष्टी से भी धनि “आना” गाँव गोडवाड की जैन पंचतीर्थी राणकपुरजी, मुछला महावीरजी. नारलाई, नाडोल व् वरकाणा के नरनरम्य शाश्वत पौराणिक तीर्थ स्थानों के मध्य बसा हुआ है| गाँव में दो सुन्दर जैन मंदिर है| यहा श्वेतांबर ओसवालों के बोरडीयो चौधरी, जोजवरिया, सोलंकी, वेदमेहता, सुन्देशा मेहता, राजावत राठोड, पुनमिया, पारेख आदि गोत्रों के ९० परिवार है| यहा से ७ पूण्यशाली आत्माओं ने संयम मार्ग पर दीक्षित होकर जैन जगत के कल्याण और दर्शन के प्रचार-प्रसार में योगदान दिया|

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह” ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने सं. १९०० के लगभग शिखरबध जिनमंदिर का निर्माण करवाकर मुलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु प्रतिष्ठा सह पाषण की २ और धातु की २ प्रतिमाए स्थापित करवाई| पहले यहां १०० जैन घर, एक उपाश्रय और एक धर्मशाला थी| श्री खीमराजजी मंदिर की वहीवट करते थे|

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श्री शांतिनाथजी मंदिर : गाँव के बीच बाजार में चारभूजाजी मंदिर के सामने श्वेत पाषण से निर्मित छोटे से शिखरबध जिनमंदिर में ८०० से ९०० वर्ष प्राचीन मुलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु की श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ, १७ इंची प्रतिमा नूतन निर्मित परिकर में प्रतिष्ठित है| जिनालय की प्रथम प्रतिष्ठा, वीर नि.सं. २४५२, शाके १८४७, वि.सं १९८२, वैशाख वदी २, गुरूवार, मई १८२३ को प्रतिष्ठा शिरोमणि गोडवाड जोजावर रत्न आ. श्री जिनेंद्रसूरीजी आ. ठा. के वरद हस्ते हुई|

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कालांतर में मंदिर के जीर्ण-शीर्ण होने से ३५ वर्ष पूर्व इस मंदिर को पूज्य गुरुदेव के शुभ आशीर्वाद से सोमपुरा द्वारा २१ दिन में बनवाकर श्री आना जैन संघ ने स्वर्ण इतिहास रचा| जिनालय की पुन: प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २५०४, शाके १८९९, वि.सं. २०३४, ज्येष्ठ शु. ११, शनिवार, दी. १७ जून १९७८ को शासन प्रभावक आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. की पावन निश्रा में हर्षोलास से संपन्न हुई|

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श्री वासुपूज्य स्वामीजी मंदिर : गाँव के मुख्य बाजार में श्री न्याती भवन के पास करीब ६० वर्ष पूर्व श्री संघ ने नया मंदिर बनवाने का निर्णय करके कार्य प्रारंभ किया| शिखरबध निर्मित जिनप्रसाद में वीर नि.सं. २४८२, शाके १८७७, वि.सं. २०१२, वैशाख सुदी ७, गुरूवार, मई १९५६ को पु. आ. श्री सिद्धिसूरीजी के निर्देशन ,में पं. कल्याणविजयजी गनि आ. ठा. की पावन निश्रा में श्वेत वरनी, २१ इंची, पद्मासनस्थ मुलनायक, पंचकल्याणउत्तम भूमि चंपापूरी के राजा १२वे तीर्थंकर श्री वासुपूज्य स्वामीजी, श्री सुमतिनाथजी, श्री सुविधिनाथजी आदि जिनबिंबो, यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा मोहत्सवपूर्वक भावोल्लास से संपन्न हुई|

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श्री कुमारचक्र की वरकाणा में सं. २०१४, फा.सु. ३, शुक्रवार को पू.आ. श्री समुद्रसूरीजी के हस्ते हुई| पंजाब केसरी, गोडवाड उद्धारक, शिक्षाप्रेमी आ. श्री वल्लभसूरीजी गुरु प्रतिमा की प्रतिष्ठा वि.सं. २०१५, वीर नि.सं. २४९४, जये. कृ. ६ भ्रूगुवार को पू. आ. श्री समुद्रसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई| जिनालय की पुन: प्रतिष्ठा, वि.सं. २०३४, जेठ सु. ११, शनिवार, दी. १७.६.१९७८ को आ. श्री पद्मसूरीजी के हस्ते संपन्न हुई|

प्रतिष्ठा शिरोमणि आ. श्री पद्मसूरीजी, पंन्यास प्रवर मु. श्री इंद्ररक्षित विजयजी आ. ठा. की निश्रा में पंचाहिंका मोहत्सव के प्रथम दिन वि.सं. २०६८, जेठ वदी ७, शनिवार, दी. १२ मई २०१२ को गुरु भगवंतो के मंगल प्रवेश के साथ नूतन निर्मित “आराधना भवन” का उद्घाटन प्रात: १०:३० बजे धूमधाम से संपन्न हुआ|

संयम पथ : गाँव “आना” में कुल ७ दीक्षाए संपन्न हुई है| श्री कानमलजी चुन्नीलालजी बोरडीया ने दी. ३०.४.१९६६ को दीक्षा ली और मु. श्री सुधर्मविजयजी बने श्री अंशीबाई पुनमिया ने दी. २५.५.१९६४ को दीक्षा ली और सा. श्री अशोकाश्रीजी का नया नाम धारण किया| श्री फूलचंदजी चुन्नीलालजी बोरडीया, पत्नी सौ. विमलाबाई, पुत्र श्री लोकेश और दो पुत्रियां चंदा एवं चारुलता ने (कुल ५ दीक्षा) दीक्षा ग्रहण कर कुल व् नगर का नाम जगत में रोशन कर दिया| पू. मु. श्री भव्यसेन विजयजी(फूलचंदजी), मु. श्री ललितसेन विजयजी (पुत्र लोकेश) ने पालीताणा रोड पर अपने दीक्षा प्रदाता गुरु आ. श्री मेरुप्रभसूरीजी की स्मृति में श्री मेरुविहार धाम(मु. लोलिया) का निर्माँ करवाया है, जिसमे जिनमंदिर व् उपाश्रय- धर्मशाला का निर्माण हुआ है| आपश्री स्थायी रूप से वही विराजते है |